रहत भरोसे एकु राधा ब्रजरानी के | ब्रज के प्राचीन कवित्त | कविरत्न गोविन्द चतुर्वेदी जी | Namamritam
नामामृतम्
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रहत भरोसे एकु राधा ब्रजरानी के | ब्रज के प्राचीन कवित्त | कविरत्न गोविन्द चतुर्वेदी जी | Namamritam
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नामामृतम्
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रहत भरोसे एकु राधा ब्रजरानी के — ब्रजभाषा के माधुर्य और श्रीराधारानी के प्रति अनन्य आश्रय के भाव से परिपूर्ण यह सुंदर कवित्त कविरत्न श्री गोविन्द चतुर्वेदी जी की रचना है।
इस कवित्त में कवि अनेक देवी-देवताओं और अवतारों का उल्लेख करते हुए अंततः अपने हृदय का भाव प्रकट करते हैं—
“कहत गुविन्द नेह नद में बहत हम,
रहत भरोसे एकु राधा ब्रजरानी के॥”
अर्थात् प्रेम की धारा में बहते हुए उनका एकमात्र भरोसा श्री ब्रज की महारानी, श्री राधारानी पर है। आगे के कवित्त में श्रीराधा के दिव्य स्वरूप, मुस्कान, नेत्रों और माधुर्य का अत्यंत सुंदर ब्रजभाषा में वर्णन मिलता है।
Credits
मूल रचना / Lyrics: कविरत्न श्री गोविन्द चतुर्वेदी जी
स्वर, धुन एवं संगीतमय प्रस्तुति: Namamritam by Ankur
यह प्रस्तुति ब्रज के प्राचीन काव्य, श्रीराधा-कृष्ण भक्ति और ब्रजभाषा की रसपूर्ण वाणी को अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुँचाने के भाव से प्रस्तुत की गई है।
राधे राधे।
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