आत्मिक “मैं “योग लगाना है अर्थ है मन ने आत्मा से योग लगाने आत्मा ने मन योग लगाना
सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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आत्मिक “मैं “योग लगाना है अर्थ है मन ने आत्मा से योग लगाने आत्मा ने मन योग लगाना
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सुर्य वन्शी नारायणी पाठ शाला
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संगम युगी सभी पुरुषार्थ आत्माओं को याद प्यार और नमस्ते एक पड़ाव पूरा हुआ, अब अगले रहस्य की ओर बडंतेहै—शिव स्मृति में, साक्षी दृष्टि से आगे बढ़ते हैं।
🕉️बहुत बडा़ प्रश्न है
याद किसको करना है?
यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
जैसे राधा को कृष्ण याद करता था, और कृष्ण को राधा—बीच में कोई तीसरा न हो। मीरा की लगन कृष्ण में हो—बीच में कोई दूसरा न हो।
वैसे ही आत्मा का योग भी एक से लगाना है। आत्मिक” मैं “ने
आत्मिक “मैं “योग लगाना है अर्थ है मन ने आत्मा से योग लगाने आत्मा ने मन योग लगाना
जिसे याद करो, अन्ततः वही चेतना में रह जाए।
देह भूल जाए, देहधारी सम्बन्धों का मोह हल्का हो जाए, नाम-रूप पीछे छूट जाए और भीतर केवल अपने सत्य, अविनाशी स्वरूप की स्मृति रह जाए।
यही “नग्न होकर ज्ञान-स्नान”करना है—
सब बाहरी आवरण उतारकर आत्म-सत्य में स्नान करना।
हर सच्चे संत, पीर, महात्मा की साधना का सार इसी एकाग्रता में मिलता है—
एक को जानो।
एक को याद करो।
एक में मन लगाओ।
और अन्ततः उसी सत्य में अपने ‘मैं’ को विलीन कर दो।
बूंद का जल में मिलना शरीर मिटाना नहीं है;
**अपनी अलग *सत्ता का अहंकार मिटाना है।
🔥 अखंड योग की अग्नि
योग का अर्थ कुछ मिनट आँखें बन्द करके फिर वही पुराना “मैं” लेकर संसार में लौट आना मात्र नहीं।
योग की परिपक्वता तब है जब—
चलते हुए योग,
बोलते हुए योग,
कर्म करते हुए योग,
सम्बन्ध निभाते हुए योग,
सुख में योग,
दुःख में योग।
यानी अखंड योग।
इसीलिए “अन्तर्मुखी सदा सुखी” केवल एक वाक्य नहीं, सम्पूर्ण साधना की दिशा है।
साधू कौन?
केवल कोई बाहरी वस्त्रधारी व्यक्ति नहीं।
तुम्हारी अपनी अन्तरात्मा—वही साक्षी आत्मा,
**जो जन्म-मरण के परिवर्तन से परे है**
अपने अविनाशी स्वरूप को पहचानती है—
मन बेचे सतगुरु के पास तिस सेवक के कारिज रास, मां को आत्मा के आगे बेचना है अविनाशी अव्यक्त सतगुरू मां के आगे बेचना है अभी तक मन ने अपनी अलग से सता बना कर रखी है
वही तुम्हारी पहली साधु की-संगत है। बुद्धि को सरस्वती कहेंगे यही तुम्हारा त्रिवेणी का संगम है यहां