Day 8 प्राचीन माण्डव्य ऋषि बड़गाव गुफा - शालीमार आश्रम - धलखेड़ा || नर्मदा पैदल परिक्रमा
COOLMADDY - Silence Speaks
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Day 8 प्राचीन माण्डव्य ऋषि बड़गाव गुफा - शालीमार आश्रम - धलखेड़ा || नर्मदा पैदल परिक्रमा
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अध्याय 8 – मंडवरिषि की प्रभात वेला और मैया के संग निरंतर यात्रा
नर्मदेहर… नर्मदेहर… नर्मदेहर…
आज हमारी नर्मदा परिक्रमा का आठवाँ दिन। प्रभात का समय था, और हम मंडवरिषि आश्रम में रात्रि विश्राम के बाद अपने आठवें दिन की शुरुआत करने वाले थे। सूर्योदय की पहली किरणें जब घने वृक्षों की शाखाओं के बीच से उतरकर धरती को स्पर्श कर रही थीं, तब वह दृश्य किसी दिव्य चित्र से कम नहीं लग रहा था—शांत, सौम्य, अलौकिक।
यह वही स्थान था जहाँ महराज जी ने प्रेम से हमें चाय परोसी थी—बिलकुल घर जैसा स्वाद, और उससे भी अधिक अपनापन। यह वही सुबह थी जिसने भीतर तक आनंद भर दिया। मंडवरिषि केंद्र में कराया गया ध्यान और मंत्रजाप की ऊर्जा आज भी तन-मन में तरंगित हो रही थी।
मंडवरिषि की प्राचीन गुफा
सुबह-सुबह मैं उस प्राचीन गुफा में बैठा—एक अद्भुत शिवलिंगाकार संरचना, जिसके गुम्बद जैसे आकार के कारण ओम का उच्चार करते ही कंपन शरीर से टकराकर कई गुना होकर लौटते हैं। उस क्षण भीतर की शांति और बाहरी प्रकृति, दोनों एकाकार हो गए थे।
गुफा से बाहर निकलते समय सामने खुलते हुए घने जंगल और मंद-मंद बहती हवा ने मन को एक बार फिर नवजीवन सा दिया। आठ बजे के आसपास हमने अपनी परिक्रमा आगे बढ़ा दी।
गाँव से गुजरने के दौरान छोटे-छोटे बच्चों को हमारी ओर भागते देख जो प्रसन्नता हुई, वह किसी शब्द में बाँधना कठिन है।
शालीमार आश्रम की ओर यात्रा
हमारा अगला पड़ाव था शालीमार आश्रम, लगभग तीन किलोमीटर आगे। कल हम वहाँ तक नहीं पहुँच पाए थे, इसलिए आज उसी दिशा में बढ़े। रास्ते भर लोग बताते रहे कि कुछ महीने पहले आई भीषण बाढ़ में नर्मदा का जलस्तर सौ फीट तक उठा था। दूर दिखाई दे रहे मंदिर के नीचे की मिट्टी बह गई थी—मैया के उफान में पूरा क्षेत्र समा गया था।
सुबह के शांत समय में नर्मदा के जल में पक्षियों को स्नान करते देखना ऐसा दृश्य था जो शहरों में शायद ही कभी देखने को मिलता है। माँ नदी के संग-साथ चलने का अनुभव ही कुछ और है—हर क्षण एक नए भाव में डुबो देता है।
रास्ते में एक छोटी धारा मिली जिसे पार करते समय भी एक अनोखा उत्साह था। मानो परिक्रमा केवल चलना नहीं बल्कि माँ की बाँहों में समर्पित हो जाना हो।
महेश्वर का दूर से दर्शन
चलते-चलते एक बिंदु पर दूर से महेश्वर घाट दिखाई दिया। वही महेश्वर जहाँ पहुँचने में अभी 60–70 दिन लगेंगे, पर इस पार से उसे देख पाने का आनंद भी अनमोल था। जब वहाँ होंगे तो यह दृश्य नहीं मिलेगा, इसलिए यह क्षण अपने आप में खास था।
सामने अहिल्याबाई का किला भी झलक रहा था—इतिहास, आस्था और प्रकृति का सौंदर्य एक साथ।
शालीमार आश्रम – शांत, हरियाली से भरा पड़ाव
लगभग साढ़े दस बजे हम शालीमार आश्रम पहुँचे। विशाल पेड़ों, खुले मैदान और पक्षियों की मधुर ध्वनि से भरा यह स्थान मन को तुरंत आकर्षित कर लेता है। वहाँ बने पक्षी-भोजन स्थलों ने मन में करुणा और सेवा का भाव जागृत किया। मंदिर में स्थापित शिवलिंगों के दर्शन के बाद हमने अन्नपूर्णा भोजन ग्रहण किया और यात्रा को आगे बढ़ाया।
खेती के बीच का मार्ग
आज की यात्रा में हम कुछ समय के लिए माँ नर्मदा से थोड़े दूर चल रहे थे। चारों ओर खेत—
• चने के हरे-भरे पौधे
• केले की कतारें
• ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्थित लाइने
दोपहर के बाद धूप हल्की हो गई थी, इसलिए चलने का आनंद फिर से लौट आया था।
जालंपुर आश्रम और मनोहारी मानवीय मुलाकातें
रास्ते में जालंपुर आश्रम मिला जहाँ चाय की प्याली और स्थानीय लोगों की मुस्कान ने थकान हर ली। यहाँ एक बुजुर्ग बाबा रोज़ाना 200 से भी अधिक परिक्रमा वासियों को चाय पिलाते हैं—नर्मदा परिक्रमा की न्यूनतम जरूरतों में भी यह सेवा सबसे ऊँची दिखाई देती है।
चलते-चलते कुछ परिक्रमा साथियों से बातचीत हुई—किसी की पहली परिक्रमा थी, किसी की चौथी। अनुभव अलग-अलग, उद्देश्य एक—माँ नर्मदा का सान्निध्य।
संध्या—मोनी बाबा आश्रम की ओर
शाम के पाँच बजे जब सूरज अस्त की ओर बढ़ रहा था, हम खेतों के बीच से गुजरते हुए मोनी बाबा के आश्रम की ओर बढ़े। वहाँ पहुँचने में केवल तीन किलोमीटर थे, पर शरीर हल्का-सा थका हुआ था, इसलिए हमने यहीं रुकने का निर्णय लिया।
और नियम तो यही कहता है—
“चाहे महाभारत का युद्ध हो
या परिक्रमा का रथ—
सूर्यास्त होते ही उसे रोक देना चाहिए।”
इसलिए आज रात हम श्री छोटू बाबा अनक्षेत्र, ग्राम डालकेड़ा में विश्राम करेंगे।
कल फिर माँ नर्मदा की कृपा से नया दिन, नई ऊर्जा और नए दृश्य लेकर यात्रा आगे बढ़ेगी।
नर्मदेहर… नर्मदेहर… नर्मदेहर…