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रक्षाबंधन ✨ कैसा बंधन.? कैसी रक्षा.? #rakshabandhan #Satpath

Vipin Jain Shastri

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रक्षाबंधन ✨ कैसा बंधन.? कैसी रक्षा.? #rakshabandhan #Satpath

3 523 просмотра · 7 дней назад
Vipin Jain Shastri
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कैसा बन्धन ? कैसी रक्षा ? व्यर्थ विकल्प करे रे। है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥ टेक ॥ दो द्रव्यों की सत्ता न्यारी, कैसे बन्धन होवे, निज स्वाधीन स्वरूप भूलकर, मूरख बन्धन जोवे। एक क्षेत्र अवगाही होने पर भी, एक नहीं है, निमित्त नैमित्तिक दिखने पर भी, कर्ता कर्म नहीं है ॥ भेदज्ञान दृष्टि से चेतन, सबसे भिन्न दिखे रे ॥ 1 ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥ अहंकार-ममकार धार पर में रागादिक ठाने, ये ही व्यावहारिक बंधन, पर्याय मात्र में जाने। पर पर्याय से भी है न्यारा, ज्ञान मात्र शुद्धातम, समयसार अविकारी अनुपम, है शाश्वत परमातम ॥ शुद्ध नय द्वारा श्री गुरु, जिसका किंचित् भाव कहें रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥ 2 जिसका जीवन मरण नहीं है, नहीं वेदना कोई, है अभेद्य स्वगुप्त सदा ही, असुरक्षा नहीं होई। आत्मन् ! तेरा अक्षुण्ण वैभव, घटे न बढ़े कदा ही, एक रूप चैतन्य रत्नाकर, रहता अचल सदा ही ॥ अन्तर सुख सागर लहरावे, फिर क्यों दुःख सहे रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥ 3 तेरे में कुछ भी नहीं होता, पर्यायें क्रमवर्ती, सदा निरन्तर होती रहतीं, रहट घड़ी ज्यों चलती। अनहोनी होवे नहि कबहूँ, होनी ही होती है, मिले पंच समवाय स्वयं ही, कभी नहीं टलती है ॥ छोड़ सभी चिंता आकुलता, पर्यय दृष्टि तज रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥ 4 है पर्यायों पर दृष्टि जब, तब सुख कैसे पावें, होते रहते भाव विकारी, भव में ही भरमावें। होनहार पर उनको छोड़ें, द्रव्यदृष्टि प्रकटावें, पर्यायें भी निर्मल होवें, आनंद उर न समावे ॥ ध्यान रहे स्वच्छंद न होना, श्री गुरु यही कहें रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥5 रक्षाबन्धन पर्व यही, मंगल संदेश सुनावे, बाह्य प्रसंगों से निरपेक्षित, ज्ञानी ध्यान लगावे । मैं अविनाशी परमानंदमय, दृढ़ प्रतीत उर धारे, उसे नहीं किंचित् भय होवे, मोहादिक रिपु जारे ॥ ऐसा मंगल पर्व मनावे, शिवपद सहज लहे रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥6 बहिन ! न मेरी ओर लखो, अब अपनी ओर निहारो, स्त्री रूप नहीं है तेरा, चेतन रूप संवारो। मंगलमय प्रभुता मत विसरो, नहीं दीनता धारो, ये विशुद्ध बंधन भी तोड़ो, मुक्तिमार्ग पग धारो ॥ कोई भय न विकल्प सतावे, निज आश्रय जु गहे रे ॥ है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥7 कैसा बन्धन ? कैसी रक्षा ? व्यर्थ विकल्प करे रे। है त्रिकाल निर्बन्ध स्व-रक्षित, अन्तर्दृष्टि लखे रे ॥