छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी तुलजा भवानी | Tulja bhavani temple mahrashtra | #ShivajiMaharaj
पिटारा पौराणिक कहानियों का
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छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी तुलजा भवानी | Tulja bhavani temple mahrashtra | #ShivajiMaharaj
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छत्रपती शिवाजी महाराज भारत के एक महान गौरवशाली राजा एवं रणनीतिकार थे। उन्होंने पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी कई वर्ष तक औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। शिवाजी महाराज की कुलदेवी तुलजा भवानी थी। मातारानी के इक्यावन शक्तिपीठों में एक तुलजा भवानी मन्दिर के बारे में आज के वीडियो में बात करेंगे।
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#शिवाजी महाराज की कुलदेवी तुलजाभवानी माँ
महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के तुलजापुर में एक ऐसा स्थान है जहाँ छत्रपति शिवाजी की कुलदेवी श्रीतुलजा भवानी स्थापित हैं। देवी का यह मंदिर आज भी महाराष्ट्र व अन्य राज्यों के कई निवासियों की कुलदेवी के रूप में प्रचलित हैं।
तुलजा भवानी महाराष्ट्र के प्रमुख मंदिरों में तथा भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से भी एक मानी जाती है। मान्यता है कि शिवाजी को खुद देवी माँ ने यहां तलवार प्रदान की थी। अभी यह तलवार लंदन के संग्रहालय में रखी हुई है।
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यह मंदिर महाराष्ट्र के प्राचीन दंडकारण्य वनक्षेत्र में स्थित यमुनांचल पर्वत पर स्थित है। माँ तुलजा भवानी की मूर्ति के बारे मे मान्यता है कि ये स्वयंभू है। इस मूर्ति की एक और खास बात यह है कि यह मंदिर में स्थायी रूप से स्थापित न होकर ‘चलायमान’ है। साल में तीन बार इस प्रतिमा के साथ प्रभु महादेव, श्रीयंत्र तथा खंडरदेव की भी ,
प्रदक्षिणापथ पर परिक्रमा करवाई जाती है।
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इस मंदिर में प्रवेश के लिये दो विशालकाय द्वार नजर आते हैं। इसके बाद एक सुसज्जित द्वार में प्रवेश करने के पश्चात गर्भ गृह में माता की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है। गर्भगृह के पास ही एक चाँदी का पलंग स्थित है, जो माता की निद्रा के लिए है। इस पलंग के दूसरी तरफ शिवलिंग स्थापित है, जिसे दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि माँ भवानी व शिव शंकर आमने-सामने बैठे हैं।
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यहाँ मौजूद चाँदी के छल्ले वाले स्तंभों के विषय में माना जाता है कि यदि आपके शरीर के किसी भी भाग में दर्द है, तो सात दिन लगातार इस छल्ले को छूने से वह दर्द समाप्त हो जाता है।
इस मंदिर से जुड़ी एक जनश्रुति यह भी है कि यहाँ पर एक ऐसा चमत्कारिक पत्थर विद्यमान है, जिसके विषय में यह माना जाता है कि यह आपके सभी प्रश्नों का उत्तर सांकेतिक रूप में ‘हा ’ या ‘नही ’ में देता है। यदि आपके प्रश्न का उत्तर ‘हा ’ है तो यह अपने आप दाहिनी ओर मुड़ जाता है और अगर ‘नही’ है तो यह बायीं दिशा में मुड़ जाता है।
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माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी किसी भी युद्ध से पहले चिंतामणि नामक इस पत्थर के पास अपने प्रश्नों के समाधान के लिए आते थे।शालीग्राम पत्थर से निर्मित यह मूर्ति भी स्वयंभू ही मानी जाती है।
इस मंदिर की ख्याति मराठा राज्य में फैली और यह देली भोसले प्रशासकों की कुलदेवी के रूप में पूजी जाने लगीं। छत्रपति शिवाजी अपने प्रत्येक युद्ध के पहले माता से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहाँ आते थे।
आज भी माँ तुलजा भवानी को मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी मनुष्य सच्चे मैं से यह माता से प्रार्थना करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
यहां यात्रियों के ठहरने के लिए मंदिर की अपनी धर्मशाला है, जो यात्रियों के लिए निःशुल्क है। परिसर के बाहर भी कई निजी होटल व धर्मशालाएँ है।
तुलजापुर तक आने के लिए कई प्रकार के यातायात साधन उपलब्ध हैं। माता के दरबार मे पहुंचने के लिए तीर्थयात्री सोलापुर तक रेल से आ सकते हैं जो कि तुलजापुर से केवल 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सोलापुर से सड़कमार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
Shivaji jayanti special maa tulja bhavani shivaji ki kuldevi
वायुमार्ग से तुलजापुर तक आने के लिए यहाँ से सबसे करीबी हवाई अड्डा पुणे व हैदराबाद हैं, जहाँ से बस या निजी वाहन द्वारा इस स्थान तक पहुँचा जा सकता है।
तो आप भी एक बार मा तुलजा भवानी के दर्शन अवश्य करे।
तुलजा भवानी की कहानी Please subscribe our channel
एक युग में करदम नामक एक ब्राह्मण साधु थे, जिनकी अनुभूति नामक अत्यंत सुंदर व सुशील पत्नी थी। जब करदम की मृत्यु हुई तब अनुभूति ने सती होने का प्रण किया, पर गर्भवती होने के कारण उन्हें यह विचार त्यागना पड़ा तथा मंदाकिनी नदी के किनारे तपस्या प्रारंभ कर दी। इस दौरान कूकर नामक राजा अनुभूति को ध्यान मग्न देखकर उनकी सुंदरता पर आसक्त हो गया तथा अनुभूति के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया। इस दौरान अनुभूति ने माता से याचना की और माँ अवतरित हुईं। माँ के साथ युद्ध के दौरान कूकर एक महिष रूपी राक्षस में परिवर्तित हो गया और महिषासुर कहलाया। माँ ने महिषासुर का वध किया और यह पर्व ‘विजयादशमी’ कहलाया। इसलिए माँ को ‘त्वरिता’ नाम से भी जाना जाता है, जिसे मराठी में तुलजा भी कहते हैं।
तुलजापुर तक आने के लिए सभी प्रकार के यातायात के साधन उपलब्ध हैं। दक्षिण से आनेवाले यात्री नालदुर्ग तक आसानी से सड़क मार्ग द्वारा आ सकते हैं। उत्तरी व पश्चिमी राज्यों से आने वाले तीर्थयात्री सोलापुर के रास्ते तुलजापुर आ सकते हैं। जबकि पूर्वी राज्यों से आने वाले यात्री नागपुर या लातूर के रास्ते यहाँ आ सकते हैं। तीर्थयात्री सोलापुर तक रेल से आ सकते हैं जो कि तुलजापुर से केवल 44 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
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पश्चिम की आंधी में हमारे बच्चे भारतीय पौराणिक पात्रों से अपरिचित हो चुकें है. इस चैनल द्वारा हमारा प्रयास भारत की सांस्कृतिक विरासत को नयी पीढ़ी तक पहुंचाना है। आपसे भी निवेदन है की वीडियो पसंद आने पर इसे आगे प्रेषित जरूर करे.. धन्यवाद, जयसियाराम