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डोईवाला में "डोई ' शब्द कहां से आया। डोईवाला का नाम कैसे पड़ा। STORY OF DOIWALA

Dug Dugi (डुग डुगी)

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डोईवाला में "डोई ' शब्द कहां से आया। डोईवाला का नाम कैसे पड़ा। STORY OF DOIWALA

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Dug Dugi (डुग डुगी)
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‪@DugDugiRajesh‬ डोईवाला नाम कैसे पड़ा, यह जिज्ञासा आज भी बनी है, पर इस पर बात करने से पहले, हम आपको बता दें, देहरादून वाला डोईवाला ही अकेला डोईवाला नहीं है, देश में एक और डोईवाला है, जो हरियाणा के यमुनानगर जिले के तहसील छछरौली का एक गांव है। डोई शब्द को लेकर दो बातें खासतौर पर सामने आईं, और इनसे जुड़ी बातें इस शानदार नगर के अतीत में भी ले गईं। खालसा फर्नीचर मार्ट के स्वामी सरदार सुरेंद्र सिंह खालसा बताते हैं, उनके पूर्वज 1898 में डोईवाला में आ गए थे, उस समय हरिद्वार से देहरादून तक रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी। पंजाब से आए पूर्वजों ने रेलवे लाइन बिछाने का एक छोटा सा कांट्रेक्ट लिया था, जिसे आप पेटी कांट्रेक्ट कह सकते हैं, उसके बाद वो यहीं बस गए। बाद में, हमने फर्नीचर का व्यवसाय शुरू किया। उन्होंने अपने पिता जी से सुना है, यहां खत्ता, जो वास्तव में डोईवाला था, में एक अंग्रेज व्यवसायी, जिनको लोग मिस्टर डोई कहकर पुकारते थे, ने नील बनाने का कारखाना खोला था। जहां उनका कारखाना था, उस जगह को डोईवाला कहते थे। उन्होंने नील बनाने के लिए सौंग नदी से नहर पहुंचाई गई थी। नील कारखाने और नहर के निशान आज भी मौजूद हैं। यह कारखाना घिस्सरपड़ी में है, जो तेलीवाला फाटक के ठीक सामने से खत्ता को जोड़ने वाली पक्की सड़क के किनारे का इलाका है। वो बताते हैं, सौंगनदी के पानी को नहर में डालने की व्यवस्था के बारे में बताया जाता है, जहां से नहर में पानी जाता था, उसको इंजन नहर कहा जाता था। आप मौके पर जाकर देख सकते हो। हम सरदार सुरेंद्र सिंह खालसा के बताए अनुसार, तेलीवाला फाटक के सामने से होते हुए घिस्सरपड़ी पहुंचे। तेलीवाला फाटक के ठीक सामने से खत्ता गांव जा रही रोड के दाहिनी ओर ईंटों से बने अर्द्ध गोलाकार स्ट्रक्चर दिखाई देते हैं, जो अंदाजन डेढ़ मीटर तक चौड़े हैं। ये तेलीवाला फाटक से लगभग आधा किमी. दूरी पर हैं। हमारी प्रदीप कुमार और सुरेश से मुलाकात हुई, जिनका कहना है वो अपने बुजुर्गों से इनके बारे में यही सुनते रहे कि ये अंग्रेजों के बनाए हैं। इसके बारे में और ज्यादा जानकारी हमें नहीं है। सुरेश बताते हैं, ये नील कारखाने तक जाने वाली नहर के अवशेष हैं, ऐसा मैंने सुना है। घिस्सरपड़ी निवासी पूर्ण सिंह वर्मा, जिनकी आयु लगभग 75 साल है, बताते हैं, मैं बचपन से इनको देख रहा हूं। हमारे पूर्वज बताते थे, ये किसी अंग्रेज ने बनाए थे, इनके ऊपर से एक नहर गुजरती थी। सौंग नदी से जोड़ी इस नहर का पानी नील कारखाने तक आता था। नील का कारखाना उनके घर से कुछ दूरी पर ही है, जिसकी दीवारें बड़े पत्थरों और सुर्खी से बनाई गई थीं। पूर्ण सिंह वर्मा हमें, नील कारखाने वाले क्षेत्र में ले जाते हैं, जहां अब मकान बन चुके हैं, पर कारखाने की पुरानी पत्थरों वाली दीवार का थोड़ा सा हिस्सा अब भी दिखाई देता है। कारखाने के पास रह रहे एक व्यक्ति बताते हैं, हमने तो नहीं देखा, पर हमारे बुजुर्गों से बताया था कि यहां धागा भी बनता था। पूर्ण सिंह वर्मा हमें खत्ता रोड पर ले गए। यह रोड सीधा डोईवाला से जुड़ती है। डोईवाला यहां से लगभग एक या डेढ़ किमी. दूर है। मुख्य रोड पर एक सिंचाई नहर दिखाते हुए कहते हैं, यहां से शुरू होती थी नील कारखाने वाली नहर। यहीं से अर्द्धगोलाकार स्ट्रक्चर के ऊपर से होते हुए नहर नील कारखाने तक जाती थी। इस दूरी के आधार पर कह सकते हैं, लगभग एक किमी. लंबी होगी। यह जमीन से ऊपर उठी हुई नहर थी, जो वक्त के साथ अब नहीं दिखती, पर उसके पिलर के रूप में ये स्ट्रक्चर नजर आते हैं। हालांकि पूर्ण सिंह वर्मा, उस समय नील कारखाना चलाने वाले शख्स के बारे में नहीं जानते। बताते हैं, उनको नहीं मालूम कि यह डोई शब्द कहा से आया। मिस्टर डोई का नाम पहले कभी नहीं सुना। पर, यह बात सही है कि जिस इलाके को अब घिस्सरपड़ी कहा जाता है, वो ही पहले डोईवाला था। मोहम्मद इशहाक बताते हैं, जहां हम बैठे हैं, वो जगह डैशवाला के नाम से जानी जाती थी। डोईवाला तो उस जगह को कहते थे, जिसे खत्ता गांव बोलते हैं। मोहम्मद इशहाक भी घिस्सरपड़ी वाले इलाके को ही डोईवाला कहे जाने की पुष्टि करते हैं। उन्होंने अपने वालिद से सुना था, पूर्व में मसूरी में राजाओं के बीच जंग हुई थी। एक राजा ने अपने सैनिकों को, डोईवाला से लगभग डेढ़-दो किमी. दूर तेलीवाला के पास रोका था। बड़ी संख्या में आए सैनिकों के लिए मिट्टी और लकड़ियों के बरतन बनाए गए थे, जिनमें खासकर, लकड़ी की चम्मचें, जिनको डोई कहा जाता है, यहां बनाई जाती थीं, क्योंकि यहां लकड़ी का साधन बहुत था। इसलिए इस जगह का नाम डोईवाला पड़ने की जानकारी बुजुर्गों से मिली है। बताते हैं, अब तो स्टील के चम्मच प्रचलन में हैं, पर ज्वालापुर (हरिद्वार) में आपको लकड़ी के चम्मच यानी डोई मिल जाएंगे। हालांकि सैनिकों के लिए मिट्टी की हांडियां भी बनाई गई थीं।