कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन - अलका सरावगी @RajkamalBooks
Ankit Narwal
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कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन - अलका सरावगी @RajkamalBooks
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Ankit Narwal
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हम अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन’ को पढ़ते हुए अपने आसपास लगातार विद्रूप होते जा रहे समय को इस तरह खुलता पाते हैं कि वहाँ अँधेरे की शक्ल साफ़ हो जाती है। इस अँधेरे को बनाने वाले घटकों में शामिल सत्ता संस्थान और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएँ कहीं दूर की कौड़ी नहीं लगती हैं। यह सामान्य से रोजमर्रा के जीवन में अब इस तरह घुस आई हैं कि हम सड़क पर चलते हुए, धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होते हुए, रोज़गार के अवसर तलाशते हुए, धार्मिक उन्माद में मतान्ध हुए लोगों के बीच अपमान का घूँट पीते हुए, साधारण-सी सुविधाएँ पा सकने के लिए भी जन-आन्दोलन करने पर मजबूर होते हुए, यह साफ़-साफ महसूस कर सकते हैं कि हम एक ही ज़मीन के दो अलग-अलग बाशिंदे क्योंकर बना दिए जा रहे हैं। यह कथा हमारे अपने समय का सच कहने वाली ज़रूरी कथा है।
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