रावण फिर जीत गया | हर इंसान में छुपा है एक दशानन | कलयुग का कड़वा सच | Epic Cinematic Song
Rapveda 2.0 и Rapveda
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रावण फिर जीत गया | हर इंसान में छुपा है एक दशानन | कलयुग का कड़वा सच | Epic Cinematic Song
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एक पुतला जलता है… लेकिन हज़ारों रावण ज़िंदा रह जाते हैं
हर साल दशहरे पर हम रावण का पुतला जलाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जिस रावण को हम बाहर जलाते हैं, क्या वह सच में हमारे भीतर से भी समाप्त हो चुका है?
जहाँ रावण के दस सिर थे, वहीं आज इंसान सौ मुखौटे पहनकर जी रहा है। जहाँ धर्म की बातें होती हैं, वहीं स्वार्थ, अहंकार, लालच, छल और पाखंड ने इंसानियत को जकड़ रखा है।
मुझको जलाने वाले, मेरे ही अंश हैं सारे… किस-किस की लंका ढहाओगे, यहाँ सब हैं मेरे मारे
हेडफ़ोन लगाकर सुनें और इस सिनेमैटिक अनुभव को महसूस करें
यह गीत रामायण से प्रेरित एक काल्पनिक, दार्शनिक और सामाजिक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य बुराई का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, लालच और अधर्म पर सवाल उठाना है।
आपके अनुसार आज सबसे बड़ा रावण कौन है — अहंकार, लालच, पाखंड या इंसान का अपना स्वार्थ
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