Ab Kahan Ho
Samajsevi
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Ab Kahan Ho
28 просмотров · 7 дней назад
Samajsevi
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यह गीत उस भक्त के मन की पुकार है, जो यमुना के तट, ब्रज की गलियों और हर सांस में अपने साँवरे कन्हैया को खोज रहा है।
“यह जो यमुना का तट, यह जो पनघट तेरा…
ढूंढता है तुम्हें दिल, यह व्याकुल मेरा…”
कन्हैया से मिलने की चाह, ब्रज की मिट्टी की महक, बांसुरी की मधुर तान और विरह में डूबे एक भक्त का मन—इन्हीं भावनाओं से जन्मा है “अब कहाँ हो साँवरे”।
यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि अपने कृष्ण को पुकारते हुए एक भक्त के हृदय की आवाज़ है। ❤️