जब साधक अपनी चेतना से भी आगे चला जाता है | श्री निसर्गदत्त महाराज #spirituality
Spiritual Spirit
0:00 / 0:00
जब साधक अपनी चेतना से भी आगे चला जाता है | श्री निसर्गदत्त महाराज #spirituality
9 600 просмотров · 1 г. назад
Spiritual Spirit
90,9 тыс. подписчиков
9 600 просмотров · 1 г. назад
#nisargadattamaharaj #spirituality #philosopher
जब साधक अपनी चेतना से भी आगे चला जाता है | श्री निसर्गदत्त महाराज
इस अध्याय में श्री निसर्गदत्त महाराज हमें उस अंतिम सत्य तक ले जाते हैं,
जहाँ साधक को अपनी व्यक्तिगत चेतना (individual consciousness) से भी ऊपर उठना पड़ता है।
महाराज स्पष्ट करते हैं कि जब तक साधक “मैं हूँ” के अनुभव से जुड़ा है,
तब तक वह अभी भी माया के सूक्ष्म क्षेत्र में है।
परंतु जब यह “मैं” — स्वयं में विलीन हो जाता है,
तभी आत्मा अपनी वास्तविक स्थिति — परमब्रह्म (Parabrahman) — को जानती है।
इस संवाद में महाराज बताते हैं —
क्यों हर गुरु का अंतिम उपदेश यही होता है कि
“अब उस चेतना को भी छोड़ दो, जो कहती है ‘मैं हूँ’।’’
क्योंकि मुक्ति किसी प्राप्ति का नाम नहीं है,
बल्कि उस भीतरी पहचान का अंत है जो हमें “व्यक्तिगत” बनाती है।
यह अध्याय आपको भीतर से हिला देगा —
क्योंकि यहाँ महाराज न केवल ज्ञान देते हैं,
बल्कि उस मौन अवस्था की ओर इशारा करते हैं
जहाँ “जानने वाला” भी समाप्त हो जाता है।