ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से । #RohanSatyarthi। #Poetry #hindisong
Rohan Satyarthi (Tiwari)
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ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से । #RohanSatyarthi। #Poetry #hindisong
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Rohan Satyarthi (Tiwari)
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ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से…
"Oob Chuka Hoon" is an original Hindi song written and released by Rohan Satyarthi / therohansatyarthi — a quiet, emotional song about hope that keeps burning you, dreams that keep breaking, and the tired courage to dream again anyway.
🎬 Animated lyric video: a lone traveller carries a tiny ember of hope through night, thorns and dawn — until the cracked pot of hope walks to the well once more.
If this song felt like your own story, tell me in the comments. You're not alone. 🤍
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⏱ Chapters
0:00 Intro
0:21 Verse 1 – जला रहा खुद को निस दिन
0:40 Verse 2 – सपने टूटे, अपने रूठे
1:05 Verse 3 – हर राह भरी है कांटों से
1:59 Verse 4 – कभी कभी तो मैं बेलों के
2:58 Verse 5 – बैठ रहा हूँ रात रात भर
3:17 Verse 6 – नया सवेरा नभ में छाया
📝 Lyrics / बोल
[Verse 1]
जला रहा खुद को निस दिन, मैं
आशा की चिंगारी से,
ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से
[Verse 2]
सपने टूटे, अपने रूठे
सब छूटे बारी बारी से
फिर क्यों साजू मैं जीवन को, इस झूठी किलकारी से
ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से
[Verse 3]
हर राह भरी है कांटों से, पर मंजिल का कोई पता नहीं
उस अनजानी मंजिल को पाने, क्या क्या मैने सहा नहीं
पर... भटक गया, तू है काफिर
सब, यह कहते बारी बारी से,
फिर भी, जला रहा खुद को निस दिन मैं
एक आशा की चिंगारी से, पर
ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से
[Verse 4]
कभी कभी तो मैं बेलों के, कांटों से भी लड़ता हूं
पर कभी कभी न जाने क्यूं, मैं फूलों से भी डरता हूं
कभी कभी यूं लगता है, कि जीत लूं सारी दुनिया को
पर कभी कभी ये लगता है कि, छोड़ चला जाऊ मैं सबको...
उथल पुथल करते जीवन में, ढूंढ रहा मैं स्थिरता को
बीत रहा पल, किसे सजोहूं? खुद को, मन को या जीवन को?
ना जाने क्यूं भाग रहा मैं, अपनी जिम्मेदारी से...
ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से...
[Verse 5]
बैठ रहा हूँ रात रात भर, अनजाने सपनो को लेकर
खोज रहा मै मंजिल को, न जाने क्यों अपनो को लेकर...
[Verse 6]
नया सवेरा नभ में छाया
उम्मीदों को फिर ले आया,
झूठी मुठी बात सुनाकर
फिर सोते ख्वाबों को जगाया...
लो, दिन बीता, लो, शाम चली
चेहरे की मुस्कान ढली,
उम्मीदों की फूटी गगर
पनघट के फिर ओर चली,
नित खुद का मै उपहास कर, क्यों
फिर सपने देखूँ बारी बारी से..
ऊब चुका हूं सच मुच मैं, अब जीवन की इस पारी से...
जीवन की इस पारी से...
✍️ Lyrics & Concept: Rohan Satyarthi
🎵 Music: Produced with SunoAI
© Rohan Satyarthi. All rights reserved.
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