क्या यही है जीवन का सच? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
शास्त्रज्ञान
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क्या यही है जीवन का सच? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
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वीडियो जानकारी: 22.12.2025, गीता समागम, पुणे
Title : हम सच को जानते हुए भी उससे मुंह मोड़ते हैं? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
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विवरण:
अर्जुन उवाच
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ।।39।।
अनुवाद:
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संदेह को पूरी तरह से नष्ट करने के योग्य आप ही हैं, क्योंकि आपसे अतिरिक्त इस संदेह को नष्ट करने वाला अन्य कोई संभव नहीं है।
श्रीभगवानुवाचपार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गतिं तात गच्छति ।। 40 ।।
अनुवाद:
श्रीकृष्ण ने कहा- हे पार्थ! उनका विनाश न तो इस लोक में होता है, और न ही उस लोक में, क्योंकि हे तात! कोई भी कल्याणकारी व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त नहीं होते।
काव्य:
जो दिख गया सम्मुख
छुपाते छुप नहीं पाता
बढ़ा सच को कभी जो
कदम वो व्यर्थ नहीं जाता
इस वीडियो में आचार्य जी भगवद् गीता के श्लोक 39 और 40 पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि अर्जुन जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में स्वयं अर्जुन ही हैं, जो सत्य को देखकर भी उससे दूर भाग जाता है। आचार्य जी बताते हैं कि जो व्यक्ति एक बार भी सत्य की झलक पा लेता है, उसका कभी पूर्ण नाश नहीं होता। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि सत्य से भागने पर भी व्यक्ति को भीतर बेचैनी और दुख मिलता है, जो अंततः उसे वापस सत्य की ओर खींचता है। आचार्य जी समझाते हैं कि यही दुख वास्तव में उसकी रक्षा करता है और उसे भटकने से रोकता है। अंततः हर व्यक्ति को सत्य की ओर लौटना ही पड़ता है, चाहे वह देर से ही क्यों न हो।
🎧 सुनिए #आचार्यप्रशांत को Spotify पर:
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संगीत: मिलिंद दाते
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