जिस मुखौटे से सौदा किया, वही घर का वारिस निकला
Drama Baazi
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जिस मुखौटे से सौदा किया, वही घर का वारिस निकला
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जिनचेंग के प्रभावशाली जी परिवार का वारिस दोहरी जिंदगी जी रहा है—दिन में संयत उत्तराधिकारी, रात में मुखौटा-धारी शासक जिसकी पकड़ शहर की धड़कनों तक है। उधर, फुराओ के पिता उसकी कोमा में पड़ी माँ का हवाला देकर उसे शक्ति और रसूख के इस घराने की दहलीज़ पर धकेल देते हैं। अपनी माँ को बचाने और खुद को आज़ाद करने के लिए फुराओ एक रहस्यमय मुखौटा-धारी से मदद माँगती है; उसे भनक भी नहीं कि वो और वही सुसंस्कृत वारिस, एक ही व्यक्ति हैं।
उस पुरुष के भीतर बदले की आग सुलगती है—वह उसके भागने और तिरस्कार का हिसाब चुकाना चाहता है। मगर साथ-साथ उसके डर, मजबूरियाँ और सच्चाई सामने आने लगती हैं। पहचानें उलटती हैं, बोर्डरूम में सौदे बदलते हैं, और परिवार के खेल में भरोसा सबसे महँगी मुद्रा बन जाता है। जब एक चेहरा दूसरे को ढक ले, तो सच की कीमत कौन चुकाएगा? क्या मुक्ति बिना किसी के टूटे संभव है?
यह कहानी है दो चेहरों की टकराहट, एक लड़की की जिद और उस शहर की जहाँ भावनाएँ भी सौदे की मेज़ पर बैठती हैं—पर आख़िरी पत्ता कौन फेंकेगा, यह अभी रहस्य है।