सर्वश्रेष्ठ वैयाकरण महर्षि पाणिनि | By Dr. Abha Singh
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सर्वश्रेष्ठ वैयाकरण महर्षि पाणिनि | By Dr. Abha Singh
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लगभग ५०० ईसा पूर्व सर्वश्रेष्ठ वैयाकरण महर्षि पाणिनि हुये जिन्होंने संस्कृत भाषा को विशुद्ध व व्यवस्थित बनाने के लिए अतीव सुदृढ़, सुसंगत तथा श्रृंखला बद्ध व्याकरण की रचना की जिसका नाम अष्टाध्यायी है। यह आठ अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें ४००० सूत्र हैं, प्रत्येक अध्याय में चार चार पाद हैं ।
इनका जन्म लगभग ५०० ईशा पूर्व उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में शालातुर नामक ग्राम में हुआ था, ऐसा कहा जाता है। इनके पिता का नाम पणिन् तथा माता का नाम दाक्षी था। कथा सरित्सागर के अनुसार उनके गुरु का नाम उपवर्ष था। पाणिनि पढ़ने में कुशल नहीं थे। कहा जाता है कि अपने पिता से डांट खाने के पश्चात् इन्होंने शिव जी की अराधना की। शिव जी प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे। समापन के समय उनके डमरू से जो ध्वनि निकली वे ही सूत्ररूप में संस्कृत व्याकरण का आधार बने। पञ्चतंत्रके एक श्लोक से विदित होता है कि इनको सिंह ने मारा था (सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत् प्राणान् प्रियान पाणिने:मित्र सम्प्राप्ति)। वैयाकरणों के मतानुसार इनकी मृत्यु त्रयोदशी को हुई थी। आज भी इस तिथि को पाणिनीय वैयाकरण पठन-पाठन नहीं करते हैं।
महर्षि पाणिनि के सूत्रबद्ध नियमों पर आधारित है संस्कृत का व्याकरण। इन्होंने सम्पूर्ण वर्ण-समुदाय को चौदह सूत्रों में प्रकट किया है। चूंकि इन सूत्रों का प्रादुर्भाव श्री महेश जी के डमरू से हुआ था इसलिए इन्हें "माहेश्वर सूत्र" कहते हैं। इन्हें प्रत्याहार-सूत्र भी कहते हैं क्योंकि इन्हीं के आधार पर अण्आदि प्रत्याहार बनते हैं। चौदह सूत्र निम्नलिखित हैं-
अ इ उ ण्।१।
ऋ लृ क्।२।
ए ओ ङ्।३।
ऐ औ च्।४।
ह य व र ट्।५।
ल ण्।६।
ञ म ङ ण न म्।७।
झ भ ञ्।८।
घ ढ ध ष्।९।
ज ब ग ड द श्।१०।
ख फ छ ठ थ च ट त व्।११।
क प य्।१२।
श ष स र्।१३।
ह ल्।१४।
इति माहेश्वरसूत्राणि
संस्कृत भाषा में स्वर को अच् कहते हैं क्योंकि अच् प्रत्याहार के अन्तर्गत सभी स्वर-अ इ उ ऋ लृ ए ओ ऐ औ आते हैं। इसी प्रकार व्यञ्जन को हल् कहते हैं क्योंकि ह से लेकर अन्तिम ल् तक के जितने वर्ण हैं सभी व्यञ्जन हैं। पाणिनि अष्टाध्यायी का प्रथम सूत्र है- वृद्धिरादैच् तथा अन्तिम सूत्र है - अ आ। पाणिनीय व्याकरण शास्त्र में कुछ भी निरर्थक नहीं है क्योंकि उन्होंने जो भी सूत्र बनाये हैं बहुत ही गहन अध्ययन करके बनाये हैं।
कुछ लोग पाणिनि पर यह दोष लगाते हैं कि उन्होंने भाषा को नियमबद्ध कर जकड़ कर अस्वाभाविक बना दिया है परन्तु ऐसा कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि पाणिनि ने भी अपने से पूर्व वैयाकरणों के शास्त्र का अध्ययन किया और जिस व्याकरण शास्त्र का निर्माण इन्होंने किया वह नियामक शास्त्र बन गया।
पाणिनीय व्याकरण अथवा शब्दानुशासन सब प्रकार से पूर्ण व अद्वितीय है इन्हीं के सूत्रबद्ध नियमों पर आधारित है संस्कृत का व्याकरण। शब्दानुशासन एवं संक्षिप्तिकरण सभी प्रकार से पूर्ण है अद्वितीय है। एक एक ध्वनि से मिलकर शब्द बना। ऐसा शब्द जिसमें अर्थ वहन और भाव बोधन की क्षमता हो, उस ध्वनि समूह को शब्द कहते हैं। समस्त शब्द जाल को संक्षिप्त करने के लिए पाणिनि ने ६ साधन अपनाये हैं
१-प्रत्याहर(संक्षिप्त कथन)
२-अनुबन्ध
३-गणपाठ
४-संज्ञायें
५-अनुवृत्ति
६-असिद्ध
पाणिनि को कम्प्युटर प्रोग्रामिंग का जनक कहा जाता है। आज विश्व भर के कम्प्युटर-वैज्ञानिक मानते हैं कि संस्कृत व्याकरण कम्प्युटर की सभी समस्यायों को हल करने में सक्षम है।१९वीं सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी-फ्रेन्ज बोप ने पाणिनि के कृतियों पर अध्ययन किया तो उन्हें आधुनिक भाषा प्रणाली को और अधिक परिपक्व करने के नये मार्ग मिले। इसके पश्चात अन्य विद्वानों ने भी इनके शास्त्र का गहन अध्ययन किया।
सम्पूर्ण विश्व में इनके समान वैज्ञानिक और परिपूर्ण शैली की पुस्तक किसी भी भाषा में उपलब्ध नहीं है। संस्कृत भाषा में जो एकरूपता एवं व्यवस्था परिलक्षित होती है, वह पाणिनि के नियम का ही परिणाम है। इन्होंने संस्कृत को जीवित भाषा के रूप में ग्रहण कर उसका अत्यंत ही वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। विस्तार और गाम्भीर्य की दृष्टि से सभी व्याकरण शास्त्रों में पाणिनि का व्याकरण शास्त्र सर्वश्रेष्ठ सिद्ध है।
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