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Doha 29(1) - 33(2)

BHAJAN PALACE

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Doha 29(1) - 33(2)

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BHAJAN PALACE
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“दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥ ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥1॥ सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर॥ प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥2॥ नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥ पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥3॥ सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥ कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥4॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥ नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥1॥ अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥ मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥ अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥3॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥ नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥4॥ सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥5॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति। बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥31॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥ बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥1॥ कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥2॥ सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥3॥ सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥ पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥4॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत। चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥32॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥ प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥1॥ सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥ कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥2॥ कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥3॥ साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥ नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा॥4॥ सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥5॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल। तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥33॥ “दीन दयाल बिरिद संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी” नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥1॥ उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥