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10. निरपेक्ष स्वरूप | छंद 7.2 | जो भेदज्ञान को भाता है, उसको स्वाश्रय से ही सुख हो

Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji

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10. निरपेक्ष स्वरूप | छंद 7.2 | जो भेदज्ञान को भाता है, उसको स्वाश्रय से ही सुख हो

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Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
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निरपेक्ष रहो, निरपेक्ष रहो, निज से ही निज में तृप्त रहो ।।टेक।। निरपेक्ष शक्तियाँ वस्तु की, निरपेक्ष परिणमन वस्तु का। नहीं रखो अपेक्षा कुछ पर से, आराधन में ही मग्न रहो॥ 1 ॥ पर से कुछ भी नहिं होता है, पर के बिन कुछ नहीं रुकता है। स्वाधीन परिणमन वस्तु का, श्रद्धान अटल ऐसा ही हो ॥ 2 ॥ जैसा मुख वैसा ही दर्पण में, सहजपने प्रतिभासित हो । हमको भी वैसा ही मिलता, जैसा व्यवहार स्वयं का हो ॥ ३ ॥ रे कूप में जैसी ध्वनि करता, प्रतिध्वनि भी वैसी आती है। भूमि में जैसा बोता है, वैसा ही सहज अंकुरित हो ॥ 4 ॥ अच्छा सोचो, अच्छा बोलो, तब तुम भी अच्छा पाओगे। रे! बुरे विचारों का दुष्फल तो, जग में सदा बुरा ही हो ॥ 5 ॥ आसक्त रहे जो जड़ तन में, वह पुनः पुनः तन धरता है। जो तन-मन से न्यारा ध्यावे, वह मुक्त सर्व कर्मों से हो ॥ 6 ॥ पर-आश्रय से जो दुखी रहे, वह भव-भव में दुःख पाता है। जो भेदज्ञान को भाता है, उसको स्वाश्रय से ही सुख हो ॥ 7 ॥ आत्मन् ! उत्तम अवसर आया, निज को समझोदुर्मोह तजो। अपना सर्वस्व है अपने में, अपने में ही संतुष्ट रहो ॥8 ॥