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सदा न संग सहेलियां। समय सदा एक जैसा नहीं रहता है।

PRABHAT SHRI

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सदा न संग सहेलियां। समय सदा एक जैसा नहीं रहता है।

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PRABHAT SHRI
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सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश। सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।। सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय। सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय।। सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण। सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।। सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह। ढलते ढलते ढल गई, तरवर की सी छाँह।।