अष्टावक्र महागीता Part 44 | मैं कौन हूँ? पहचान के पार का सत्य | Osho Pravachan
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अष्टावक्र महागीता Part 44 | मैं कौन हूँ? पहचान के पार का सत्य | Osho Pravachan
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हम अपने नाम, शरीर और विचारों को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेते हैं। लेकिन क्या हमारी पहचान वास्तव में इतनी ही है?
ओशो की अष्टावक्र महागीता के इस भाग में स्वयं को जानने और अपनी मान्यताओं से आगे देखने की आध्यात्मिक दृष्टि को समझें। जब मनुष्य स्वयं से गहरा प्रश्न करता है, तब आत्मचिंतन की यात्रा शुरू होती है।
सुनिए ओशो का यह प्रवचन और अपने भीतर उठने वाले प्रश्नों को नई दृष्टि से देखिए।
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