बहू का छोटा सा जवाब/emotional/ story /
kahani kisse siddhi voice
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बहू का छोटा सा जवाब/emotional/ story /
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बहू का छोटा सा जवाब सुबह का समय था। आँगन में हल्की धूप उतर रही थी। रसोई से बर्तनों की आवाज़ और मसालों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। नैना चुपचाप सबके लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। तभी कमरे से सविता की धीमी आवाज़ आई। “नैना बेटा, एक काम करेगी?” नैना ने तुरंत गैस धीमी की और बाहर आकर बोली, “जी मम्मी जी, बताइए।” सविता कुछ झिझकते हुए बोलीं, “गोविंद जी के दाँतों में बहुत दर्द है। डॉक्टर ने कहा है कि कुछ दिनों तक उन्हें नरम खाना ही देना है। उनके लिए थोड़ी पतली मूंग दाल की खिचड़ी बना देना। रोटी अभी उनके लिए ठीक नहीं रहेगी।” “जी मम्मी जी, मैं अभी बना देती हूँ।” नैना वापस रसोई में चली गई। घर में उसकी शादी को तीन साल हो चुके थे। इन तीन वर्षों में उसने घर की जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाया था। सुबह सबसे पहले उठना, सबके लिए चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, ससुर की दवाइयाँ समय पर देना, पति रोहित के लिए टिफिन बनाना और फिर घर की सफाई करना—नैना की दिनचर्या बन चुकी थी। लेकिन एक बात उसे अंदर से परेशान करती थी। घर में उसके किए हुए काम को कोई बुरा नहीं कहता था, लेकिन कोई उसकी मेहनत की तारीफ भी नहीं करता था। रोहित अक्सर ऑफिस के काम में व्यस्त रहता था और सविता को लगता था कि बहू का काम तो घर संभालना ही है। उस दिन नैना ने गोविंद प्रसाद के लिए बहुत ध्यान से खिचड़ी बनाई। उसमें मूंग दाल, चावल और थोड़ी-सी सब्जियाँ डालकर उसे खूब नरम किया। उसने खिचड़ी कटोरे में परोसी और कमरे में ले गई। “बाबूजी, आपकी खिचड़ी।” गोविंद प्रसाद ने मुस्कुराकर कटोरा लिया। “बहू, भगवान तुम्हें खुश रखे।” नैना मुस्कुरा दी। “पहले आप खा लीजिए, फिर आशीर्वाद दीजिएगा।” गोविंद प्रसाद ने खिचड़ी खाई। दर्द के बावजूद उनके चेहरे पर संतोष दिखाई दिया। “बहुत अच्छी बनी है।” नैना ने कहा, “आपको पसंद आई, यही मेरे लिए काफी है।” वह वापस रसोई में चली गई। लेकिन उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में यही छोटी-सी खिचड़ी उसके जीवन में एक ऐसा बदलाव लाने वाली थी, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। -- कुछ दिन बाद गोविंद प्रसाद के दाँतों का दर्द थोड़ा ठीक हो गया। डॉक्टर ने उन्हें सामान्य भोजन धीरे-धीरे शुरू करने की सलाह दी। लेकिन एक शाम जब रोहित ऑफिस से घर लौटा तो उसने देखा कि उसके पिता के कमरे में खाने की प्लेट रखी थी। “माँ, पापा को खाना दे दिया?” सविता बोलीं, “हाँ।” रोहित ने प्लेट देखी तो उसमें फिर खिचड़ी थी। “लेकिन अब तो पापा ठीक हैं। फिर खिचड़ी क्यों?” सविता ने कहा, “नैना को मैंने कहा था कि कुछ दिन और नरम खाना दे।” रोहित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी रात उसने नैना से पूछा, “तुम पापा को अभी भी खिचड़ी क्यों दे रही हो?” नैना ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी ने कहा था कि कुछ दिन और नरम खाना देना अच्छा रहेगा। मैंने सोचा उनकी तबीयत पूरी तरह ठीक हो जाए।” रोहित कुछ नहीं बोला। अगले दिन वह ऑफिस चला गया। लेकिन दोपहर में गोविंद प्रसाद ने अपनी पत्नी से कहा, “सविता, अब मैं ठीक हूँ। बहू को बार-बार परेशान मत किया करो। वह पूरे दिन काम करती रहती है।” सविता ने थोड़ा नाराज़ होकर कहा, “मैं उसे परेशान नहीं करती। घर की बहू है, घर का काम तो करेगी ही।” गोविंद प्रसाद चुप हो गए। वह जानते थे कि उनकी पत्नी बुरी नहीं थीं, लेकिन कई बार उन्हें अपनी बहू की मेहनत दिखाई नहीं देती थी। -- एक दिन अचानक घर में एक बड़ा मेहमान आने वाला था। रोहित के ऑफिस के कुछ महत्वपूर्ण लोग शहर से उनके घर आने वाले थे। रोहित ने माँ से कहा, “माँ, आज शाम घर में मेहमान आएँगे। खाना थोड़ा अच्छा बनाना।” सविता ने तुरंत नैना को आवाज़ दी। “नैना! आज शाम बहुत काम है। पूरी तैयारी करनी होगी।” “जी मम्मी जी।” सुबह से नैना काम में लग गई। उसने घर साफ किया, सब्जियाँ काटीं, मिठाई बनाई, मेहमानों के लिए नाश्ता तैयार किया और रात के खाने की तैयारी भी शुरू कर दी। दोपहर तक वह थक चुकी थी। तभी सविता ने कहा, “नैना, मेरे कमरे की अलमारी भी साफ कर देना।” नैना ने अपनी थकान छिपाते हुए कहा, “जी।” वह अलमारी साफ करने लगी। अलमारी के सबसे नीचे उसे एक पुरानी फाइल मिली। उसने उसे उठाकर सविता के हाथ में दे दिया। “मम्मी जी, ये फाइल नीचे रखी थी।” सविता ने फाइल देखते ही उसे तुरंत अपने पास रख लिया। “ठीक है, तुम अपना काम करो।” नैना वहाँ से चली गई। उसे उस फाइल के बारे में कुछ पता नहीं था। शाम को मेहमान आए। घर में खूब चहल-पहल हुई। नैना ने सभी का बहुत अच्छे से स्वागत किया। एक मेहमान ने खाने की तारीफ करते हुए कहा, “रोहित, आपकी पत्नी बहुत समझदार और सलीकेदार हैं। इतना सब अकेले संभाल लिया।” रोहित मुस्कुराया। सविता ने पहली बार महसूस किया कि लोग नैना के काम को ध्यान से देख रहे थे। उस रात जब सभी मेहमान चले गए तो रोहित ने नैना से कहा, “आज तुमने बहुत काम किया। धन्यवाद।” नैना के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। “घर का काम है। इसमें धन्यवाद कैसा?” रोहित ने पहली बार उसकी आँखों में थकान देखी। “तुम हमेशा इतनी ही बातें क्यों करती हो?” नैना ने हँसकर कहा, “क्योंकि अगर मैं ज्यादा बोलूँगी तो काम कौन करेगा?” दोनों हँस पड़े। दरवाजे के पीछे खड़ी सविता ने यह सब सुन लिया। उस रात वह देर तक सो नहीं पाईं। --- कुछ दिनों बाद गोविंद प्रसाद की तबीयत अचानक खराब हो गई। उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। डॉक्टर ने कुछ जाँचें लिखीं। रोहित परेशान हो गया। “माँ, इतनी सारी जाँचों के पैसे कहाँ से आएँगे?” सविता चुप थीं। तभी नैना ने कहा, “आप चिंता मत कीजिए। पहले बाबूजी का इलाज जरूरी है।” रोहित बोला, “लेकिन पैसे—” नैना ने अपनी अलमारी से एक लिफाफा निकाला। “ये रखिए।” रोहित