Перейти к содержимому

Part-1, कक्षा-8, पाठ-5, तोड़ती पत्थर, भावार्थ / व्याख्या - साक्षी हिंदी पाठमाला

A2Z Smart Classes

0:00 / 0:00

Part-1, कक्षा-8, पाठ-5, तोड़ती पत्थर, भावार्थ / व्याख्या - साक्षी हिंदी पाठमाला

2 668 просмотров · 4 года назад
A2Z Smart Classes
5,49 тыс. подписчиков
2 668 просмотров · 4 года назад
Part-1, Class-8, Chapter-5, Todti Pathar, Bhavarth Vyakhya Sakshi Hindi Pathmaala शिक्षण संकेत: बच्चों को बताएँ कि यह कविता हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी द्वारा रचित है। इन्होंने छंद-बद्ध काव्य श्रृंखला को तोड़कर मुक्त छंद की स्थापना की है और अनेक कालजयी कविताओं की रचना की है। इस कविता में कवि ने नारी के सुदृढ़ मनोबल और सतत संघर्षशीलता का सुंदर चित्रण किया है। बच्चों को कर्म की महत्ता के बारे में बताएँ। बच्चों में मजदूरों के प्रति सम्मान एवं समानता का भाव जागृत करें। तोड़ती पत्थर वह तोड़ती पत्थर | देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर वह तोड़ती पत्थर | नहीं छायादार पेड़, वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार | श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन प्रिय कर्मरत मन। गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार सामने तरु मालिका अट्टालिका प्राकार, व्याख्या : प्रस्तुत पंक्तियों में इलाहबाद की सड़क के किनारे एक वृक्ष के नीचे, जिसमें छाया का अभाव है, एक पत्थर तोड़नेवाली मजदूरिन पत्थर तोड़ने में तल्लीन है। उसका शरीर साँवला और स्वस्थ था | वह भरपूर यौवन से युक्त थी | उसकी आंखें नारी सुलभ लज्जा से झुकी हुई थी और वह पूर्ण निष्ठा से अपने प्रिय कार्य अर्थात पत्थर तोड़ने में निमग्न थी | उसके हाथ में एक भारी हथौड़ा था जिससे वह पत्थरों पर बार-बार चोट कर रही थी। जहां वह कार्य कर रही थी उसके सामने पेड़ों की पंक्ति, विशाल भवन एवं उनकी चारदीवारी थी | चढ़ रही थी धूप। गरमियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप। उठी झुलसाती हुई लू. रुई ज्यों जलती हुई भू गर्द चिनगी छा गई. प्रायः हुई दुपहर वह तोड़ती पत्थर । व्याख्या : ग्रीष्म ऋतु का समय था | दिन चढ़ने के साथ-साथ धूप भी तेज होती जा रही थी | दिन अधिक गर्मी के कारण तमतमा रहा था | शरीर को झुलसा देने वाले गर्म हवाएँ चल रही थी | पृथ्वी गर्मी के कारण ऐसे जल रही थी मानो रुई जल रही हो | लगभग दोपहर का समय हो गया था | भयंकर गर्मी पड़ रही थी ऐसे में वह श्रमिक महिला पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही थी | देखते देखा मुझे तो एक बार, उस भवन की ओर देखा, छिन्न तार । देखकर कोई नहीं, देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं। सजा सहज सितार, सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार । एक क्षण के बाद वह काँपी सुधर, हुलक माथे से गिरे सोकर, लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा "मैं तोड़ती पत्थर !" -सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' व्याख्या : कवि कहता है कि इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही उस युवती ने जब मुझे अपनी ओर ताकते हुए देखा तो उसने बड़े दु:ख और हताशा के साथ एक बार सामने खड़े भवन की ओर देखा | उसने उस भवन को ऐसे देखा जैसे कुछ ना देख रही हो | उसने मुझे देखा तो मुझे उसकी दृष्टि में वह भाव नजर आया जैसे एक भय ग्रस्त बच्चा मार खाने पर भी भय से रोता नहीं है | अपने प्रति सहानुभूति की भावना को देखकर उसकी भावनाओं की वीणा के तार झंकृत हो उठे और ऐसी ध्वनि सुनाई दी जो मैंने आज तक नहीं सुनी थी | कहने का भाव यह है कि कवि ने पीड़ा का ऐसा स्वर कभी नहीं सुना था | तभी वह युवती काँप उठी और उसके माथे से पसीने की बूंदे ढुलक कर नीचे गिर गयी | तत्पश्चात वह युवती फिर से अपने कार्य में तल्लीन हो गई | उसे पत्थर तोड़ते हुए देखकर ऐसा आभास हो रहा था मानो वह कह रही हो कि मैं पत्थर तोड़ने वाली हूँ; मेरा कार्य है | कहने का अभिप्राय यह है कि वह पत्थर तोड़ने वाली स्त्री पत्थर तोड़ना ही अपनी नियति मान चुकी है |