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निराकार शिव — मेरी यात्रा. By Vikrant Sharma

vikrant sharma

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निराकार शिव — मेरी यात्रा. By Vikrant Sharma

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vikrant sharma
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निराकार शिव — मेरी यात्रा शिव को किस आकार में बाँधूँ? जब आकार भी उन्हीं से है। किस मूर्ति में उन्हें सीमित करूँ? जब हर कण में उनका बसेरा है। किस चिन्ह में उन्हें बाँधूँ, किस शब्द में उनका वर्णन करूँ? मेरी बुद्धि जहाँ तक पहुँचती है, शिव उससे भी आगे खड़े हैं। वो मंदिर की घंटी में हैं, वो श्मशान की राख में हैं, वो गंगा की हर धारा में हैं, वो कैलाश की हर साँस में हैं। वो ओंकार की पहली ध्वनि हैं, वो मौन का अंतिम अर्थ हैं। वो अग्नि हैं, वो भस्म हैं, वो मृत्यु हैं, वो अमरत्व हैं। जो कुछ है—वो शिव है। जो कुछ था—वो शिव था। जो कुछ होगा—वो भी शिव होगा। ये शरीर मेरा नहीं, ये साँस मेरी नहीं, ये जीवन मेरा नहीं— सब उसी का दिया हुआ है। जो कल बीत गया, वो भी उसकी लीला थी। जो आज मेरे हाथ में है, वो भी उसकी इच्छा है। और जो कल मेरी प्रतीक्षा कर रहा है— उसका स्वामी भी वही है। तो फिर किस बात का अहंकार? मैं आया कहाँ से? उसी से। मैं जी रहा किसके कारण? उसी से। और जब ये यात्रा समाप्त होगी— जाऊँगा कहाँ? उसी में। इसलिए मेरी मंज़िल शिव को ढूँढना नहीं है। क्योंकि जिसे मैं ढूँढ रहा हूँ, वो कभी मुझसे दूर था ही नहीं। मेरी मंज़िल है— अपने भीतर के उस पर्दे को हटाना, जो मुझे शिव से अलग समझता है। ‘मैं’ को छोटा करना है, ‘शिव’ को बड़ा नहीं। क्योंकि शिव को बड़ा करने की मेरी औकात ही क्या है? वो तो अनंत हैं— मैं केवल उनकी एक बूंद हूँ। वो महासागर हैं— मैं उसी का एक अंश हूँ। और मेरी पूरी यात्रा बस इतनी है— हर श्वास में उन्हें याद करूँ, हर कर्म उन्हें समर्पित करूँ, हर कठिनाई में उन्हें देखूँ, हर सफलता में अहंकार छोड़ दूँ। गिरूँ तो—शिव। उठूँ तो—शिव। जीतूँ तो—शिव। हारूँ तो—शिव। और जिस दिन अंतिम श्वास चले, उस दिन भी कोई शिकायत न हो— बस इतना एहसास हो… “महादेव, मैं आपको पाने नहीं आया था, मैं तो स्वयं को खोने आया था— आपमें।” शायद इस जन्म में मैं पूरी तरह शिव को न पा सकूँ। शायद मेरी साधना अधूरी रह जाए, शायद मेरा मन बार-बार भटक जाए, शायद मैं अभी भी अपने ‘मैं’ में उलझा रहूँ। लेकिन अगर इस जीवन में एक पल भी ऐसा मिल जाए— जब मन बिल्कुल शांत हो, जब अहंकार बिल्कुल मौन हो, जब भीतर से केवल एक आवाज़ आए— “तू और मैं अलग नहीं…” तो समझूँगा— मेरी यात्रा सफल हुई। फिर न कोई रूप चाहिए, न कोई प्रमाण चाहिए, न कोई शब्द चाहिए। बस मौन चाहिए। और उस मौन में— शिव। ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव।