जो मैं ही हूँ, वही अपरिचित क्यों? | Adhyatma Upanishad by Osho | Part 1/4
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जो मैं ही हूँ, वही अपरिचित क्यों? | Adhyatma Upanishad by Osho | Part 1/4
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जो सदा से हमारे सबसे पास है, जो हमारे भीतर ही छुपा है, उसी से हम अपरिचित क्यों रह जाते हैं? ओशो अध्यात्म उपनिषद के इस प्रवचन में आत्म-पहचान और परमात्मा के असीम सागर का गहरा रहस्य समझाते हैं।
मुख्य बिंदु:
• जो स्वयं है, मनुष्य उसी को जानने से क्यों चूक जाता है?
• परमात्मा और आत्मा का संबंध: सदा निकट होने का रहस्य
• मछली और सागर का दृष्टांत: दूरी के बिना पहचान क्यों असंभव लगती है?
• वासना का वास्तविक अर्थ: दूरी मिटाने का प्रयास
Series: Adhyatma Upanishad | Episode: 2 | Part: 1/4
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