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संन्यासी बनने के लिए आलीशान जिंदगी को त्यागा, खेलने-कूदने की उम्र में जैन धर्म ग्रहण किया..Jain Monk

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संन्यासी बनने के लिए आलीशान जिंदगी को त्यागा, खेलने-कूदने की उम्र में जैन धर्म ग्रहण किया..Jain Monk

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गुजरात के एक धनी हीरा व्यापारी की आठ वर्षी कि बेटी ने संन्यासी बनने के लिए आलीशान जिंदगी को त्याग करने का फैसला लिया है। इस लडकी का नाम देवांशी धनेश संघवी हें |हजारों लोगों की मौजूदगी में आज यानी बुधवार सुबह छह बजे से उनकी दीक्षा शुरू हो चुकी है | देवांशी, जैनाचार्य कीर्ति यश सूरीश्वर महाराज से दीक्षा ले रही हैं। देवांशी को दो छोटी बेहने है। खेलने-कूदने की उम्र में देवांशी जैन धर्म ग्रहण कर संन्यासिनी बनने जा रही हैं । सूरत के हीरा व्यापारी संघवी मोहन भाई की पोती और धनेश-अमी बेन की 9 साल की बेटी देवांशी ने संन्यास ले लिया | देवांशी का दीक्षा महोत्सव वेसू में 14 जनवरी को शुरू हुआ था। आज यानी बुधवार को सुबह 6 बजे से उनकी दीक्षा शुरू हो चुकी है। देवांशी ने 35 पैंतीस हजार से ज्यादा लोगों की मौजूदगी में जैनाचार्य कीर्ति यश सूरीश्वर महाराज से दीक्षा ली । देवांशी के परिवार के ही स्व. ताराचंद का भी धर्म के क्षेत्र में एक विशेष स्थान था। उन्होंने श्री सम्मेदशिखर का भव्य संघ निकाला | और आबू की पहाडिय़ों के नीचे संघवी भेरूतारक तीर्थ का निर्माण करवाया था। संगीत, भरतनाट्यम और कई क्षेत्र में एक्सपर्ट हैं देवांशी सूरत में ही देवांशी की वर्षीदान यात्रा निकाली गई थी। इसमें 4 हाथी, 20 घोड़े, 11 ऊंट थे । देवांशी 5 भाषाओं की जानकार है। वह संगीत, स्केटिंग, मेंटल मैथ्स और भरतनाट्यम में एक्सपर्ट है। देवांशी को वैराग्य शतक और तत्वार्थ के अध्याय जैसे महाग्रंथ कंठस्थ हैं। कभी नहीं देखा टीवी, और 8 साल तक किए तीन सौ सत्तावन दीक्षा दर्शन, देवांशी ने 8 साल की उम्र तक तीन सौ सत्तावन 357 दीक्षा दर्शन, 500 किमी पैदल विहार, तीर्थों की यात्रा और कई जैन ग्रन्थों का वाचन कर तत्व ज्ञान को समझा। देवांशी के माता-पिता अमी बेन, धनेश भाई संघवी ने बताया कि उनकी बेटी ने कभी टीवी देखा नहीं | जैन धर्म में प्रतिबंधित चीजों को कभी इस्तेमाल नहीं किया। न ही कभी भी अक्षर लिखे हुए कपड़े पहने। देवांशी ने न केवल धार्मिक शिक्षा में, बल्कि क्विज में गोल्ड मेडल अर्जित किया। 4 महीने की उम्र में त्याग दिया था रात का खाना अमी बेन धनेश भाई संघवी ने बताया कि देवांशी जब 25 दिन की थी तब से नवकारसी का पच्चखाण लेना शुरू किया। 4 महीने की थी तब से रात्रि भोजन का त्याग कर दिया था। 8 महीने की थी तो रोज त्रिकाल पूजन की शुरुआत की | 1 साल की हुई तब से रोजाना नवकार मंत्र का जाप किया। 2 साल 1 माह से गुरुओं से धार्मिक शिक्षा लेनी शुरू की और 4 साल 3 माह की उम्र से गुरुओं के साथ रहना शुरू कर दिया था। इनका परिवार एक विशाल व्यवसाय के मालिक होने के बावजूद, परिवार एक साधारण जीवन जीता है। उनका परिवार संघवी एंड संस नाम की हीरा कंपनी चलाता है, जो दुनिया की सबसे पुरानी हीरा कंपनियों में से एक है। वयस्क होने पर देवांशी को विरासत में करोड़ों का हीरा कारोबार मिलता। लेकिन इसके बजाय, आठ साल की बच्ची देवांशी ने बुधवार को सूरत में आलिशान जिंदगी को त्याग कर संन्यास ग्रहण किया हें | #jainmandir #jain #jainism #jainmonk #diksha #jaindiksha