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रत्नाकर बाल ब्रह्मचारी श्री बसंत महाराज जी। श्री तारण तरण जैन चैत्यालय खरी फाटक से विदिशा से लाईव

Jain Taranvani जैन तारणवाणी

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रत्नाकर बाल ब्रह्मचारी श्री बसंत महाराज जी। श्री तारण तरण जैन चैत्यालय खरी फाटक से विदिशा से लाईव

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श्री न्यानसमुच्चयसार जी इस ग्रंथ में ९०८ गाथायें हैंग्रंथ के नाम के अनुसार द्वादशांग वाणी रूप ज्ञान के समुच्चय का सारभूत कथन, ११ अंग, १४ पूर्व का वर्णन, ज्ञानी की महिमा, साधुपद का विशद् विवेचन सत्ताईस तत्त्व, १४ गुणस्थान, पंचाचार आदि सभी अध्यात्म और आगम के सैद्धान्तिक विषयों का गहन गंभीर वर्णन किया गया है । सम्पूर्ण जिनवाणी (ज्ञान के समुच्चय) का सार क्या है ? यह भी बहुत सुगमता से इस ग्रंथ में बताया है । परमानंद पद की प्राप्ति में सहायक एक ज्ञान ही है। उस ज्ञान की प्राप्ति के लिये आर्त रौद्र ध्यान को त्याग कर, धर्म शुक्ल ध्यान का अभ्यास और जिनवाणी का स्वाध्याय आवश्यक है, जिससे सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति हो सकेइसकी पूर्ति हेतु ११ अंग, १४ पूर्व का पठन पाठन मनन करना चाहिये । सारांश यह है कि बिना ज्ञान के कोई भी क्रिया सफल नहीं हो सकती । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान पूर्वक सम्यक्चारित्र होता है, यह रत्नत्रय की एकता ही मोक्ष का मार्ग है PDF link https://drive.google.com/file/d/1PEoO... https://www.instagram.com/jaintaranva... #प्रवचन #jain #motivation #adhyatam #अध्यात्म #prabachan #jinvani