दोनों स्वरूपों का मिलाप। श्री बीतक चर्चा दिवस- १० (२०२६)। वक्ता: आचार्य अशोक जी।@shrirajanswami
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इस प्रसंग में श्री देवचंद्र जी और मिहिरराज जी (श्री प्राणनाथ जी) के प्रथम मिलन, उनकी अलौकिक लीलाओं और आत्म-जागृति के अमूल्य प्रसंगों का सुंदर वर्णन किया गया है।
दोनों स्वरूपों का मिलाप: श्यामा जी और इंद्रावती जी के स्वरूपों का अद्भुत आध्यात्मिक मिलन।
सद्गुरु की कृपा व चमत्कारिक लीलाएँ: श्री देवचंद्र जी के हृदय धाम में अक्षराती राज जी के विराजमान होने के बाद की प्रत्यक्ष कृपा, जहाँ ईर्ष्यालु लोगों की शिकायतों पर आए सिपाहियों को राज जी की लीला द्वारा दिशाभ्रमित कर रक्षा की गई।
12 वर्ष की अवस्था में प्रथम मिलन: मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में मिहिरराज जी का विरह, उनकी जिज्ञासा और भाई गोवर्धन जी के साथ गांगजी भाई जी के घर आगमन।
विद्वान भट्ट जी से प्रश्नोत्तर: जब पारिवारिक विवाद के बाद भट्ट जी से 14 लोक, 5 तत्व, 3 गुण और 4 प्रलय के परे अक्षरातीत धाम के बारे में गूढ़ प्रश्न पूछे गए, जिनका उत्तर कोई साधारण विद्वान न दे सका।
कठोर साधना व आत्म-अवलोकन: 25वें वर्ष में मिहिरराज जी का बढ़ता वैराग्य, अपने अवगुणों को ढूंढना, माया-मोह व आभूषणों का त्याग, और प्रियतम परब्रह्म -प्राप्ति के लिए की गई कठिन साधना।
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श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ के मुख्य उद्देश्य -
ज्ञान, शिक्षा, उच्च आदर्श, पावन चरित्र व भारतीय संस्कृति का समाज में प्रचार करना तथा वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित आध्यात्मिक मूल्य द्वारा मानव को महामानव बनाना और श्री प्राणनाथ जी की ब्रम्हवाणी के द्वारा समाज में फ़ैल रही अंध-परम्पराओं को समाप्त करके सबको एक अक्षरातीत की पहचान कराना।
अति महत्वपूर्ण नोट :-
यह पंचभौतिक शरीर हमेशा रहने वाला नहीं है।
प्रियतम परब्रह्म को पाने के लिये यह सुनहरा अवसर है।
अतः बिना समय गवाएं उस अक्षरातीत पाने के लिये प्रयास करना चाहिये।
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आत्मिक दृष्टि से परमधाम, युगल स्वरुप तथा अपनी परआत्म को देखना ही चितवनि (ध्यान) है। चितवनि के बिना आत्म जागृति संभव नहीं है। संसार की अब तक की प्रचलित सभी ध्यान पद्धतियाँ निराकार-बेहद से आगे नहीं जाती हैं। तारतम ज्ञान के प्रकाश में मात्र निजानन्द योग ही परमधाम ले जा सकता है।
प्रियतम अक्षरातीत की चितवनि में इतना आनन्द है कि उसके सामने संसार के सभी सुख मिलकर भी कहीं नहीं ठहरते। यही कारण है कि ध्यान का आनन्द पाने के लिये ही राजकुमार सिद्धार्थ, महावीर, भर्तृहरि आदि ने अपने राज-पाट को छोड़ दिया और वनों में ध्यानमग्न रहे।
बेहद मण्डल - इस प्राकृतिक जगत् से परे वह बेहद मण्डल है, जिसे योगमाया का ब्रह्माण्ड कहते हैं। चारों वेदों में इसे चतुष्पाद विभूति के रूप में वर्णित किया गया है। इस मण्डल में अक्षर ब्रह्म के चारों अन्तःकरण (मन, चित, बुद्धि तथा अहंकार) की लीला होती है, जिन्हें क्रमशः अव्याकृत, सबलिक, केवल और सत्स्वरूप कहते हैं।
परमधाम - बेहद मण्डल से परे वह स्वलीला अद्वैत परमधाम है, जिसके कण-कण में सच्चिदानन्द परब्रह्म की लीला होती है। यह अनादि है, अनन्त है और सच्चिदानन्दमय है। जिस प्रकार सागर अपनी लहरों से तथा चन्द्रमा अपनी किरणों लीला करता है, उसी प्रकार अक्षरातीत भी अपनी अभिन्न स्वरूपा अंगरूपा आत्माओं के साथ अद्वैत लीला करते हैं, जो अनादि है और इसमें कभी अलगाव नहीं होता है।
वेदों ने इसी परमधाम के सम्बन्ध में “त्रिपादुर्ध्व उदैत्पुरुष” अर्थात् परब्रह्म योगमाया से परे है, कहकर मौन धारण कर लिया। मुण्डकोपनिषद् ने भी 'दिव्य ब्रह्मपुर' शब्द का प्रयोग तो किया, किन्तु उसे बेहद मण्डल (केवल ब्रह्म) में मान लिया। कुरआन में मेयराज के वर्णन के द्वारा संकेत किये जाने पर भी मुस्लिम जगत अभी इसकी वास्तविकता से बहुत दूर है।
श्री प्राणनाथजी की अलौकिक तारतम वाणी में इस परमधाम की शोभा, लीला एवं आनन्द का विशद रूप में वर्णन किया गया है, जिसका सुख किसी सौभाग्यशाली को ही प्राप्त होता है।