ईश्वर का प्रिय होता है जिनके इन भावों में होते हैं बृहस्पति #jupiter #astrology
nakul Parashara
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ईश्वर का प्रिय होता है जिनके इन भावों में होते हैं बृहस्पति #jupiter #astrology
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प्रिय दर्शको, नमस्कार| वक्री गुरु वाले जातक आमतौर पर अन्य लोगों से अलग होते हैं। ये प्रायः उस कार्य में सफलता अर्जित कर लेते हैं जिसमें दूसरे लोग फेल हो जाते हैं। जहां दूसरे लोग थक हार जाते हैं, वहां से वक्री गुरु वाले लोग कार्य प्रारंभ करते हैं और उसमें सफल होते हैं। ऐसे लोग एक सफल मैनेजमेंट जानने वाले होते हैं। ये बंद हो चुकी परियोजनाओं में हाथ डाले तो उसमें भी जान आ जाती है। वक्री गुरु वाले जातक दूरदर्शी होते हैं तथा जल्दबाजी में विश्वास नहीं रखते।
लग्न में यदि लग्न या प्रथम भाव में गुरु वक्री हो तो जातक किसी के प्रति ठीक से न्याय नहीं कर पाता है। ऐसे व्यक्ति में ईमानदारी और समझ की कमी होती है| ऐसा व्यक्ति निरोगी तथा सुंदर शरीर वाला होता है।
द्वितीय भाव में गुरु वक्री हो तो जातक आर्थिक मामलों को ठीक से मैनेज नहीं कर पाता है। इसे कुटुंब व पत्नी से अच्छा सुख मिलता है।
तीसरे भाव में वक्री गुरु होेने पर जातक शैक्षणिक कार्यों में लापरवाह रहता है। ऐसा व्यक्ति कई बार नास्तिक देखा गया है। जातक की निर्णय क्षमता भी कमजोर होती है।
चौथे भाव में गुरु वक्री होने पर जातक में अहंकार व घमंड होता है। जातक असामाजिक हो जाता है।
पंचम भाव में वक्री गुरु हो उसका अपने बच्चों के प्रति अधिक लगाव नहीं होता है। ऐसा जातक अपनी पत्नी में अधिक रुचि ना लेते हुए पराई स्त्रियों की ओर आकृष्ट रहता है। इन्हें गुप्त रोग भी घेर लेते हैं। पंचम स्थान का गुरु विफल माना गया है।
छठे भाव का वक्री गुरु जातक को अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बनाता है। ये दिखने में तो तंदुरुस्त होते हैं लेकिन भीतर ही भीतर इन्हें डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, लिवर संबंधी रोग घेरे रहते हैं। इतना होने के बावजूद ये खानपान का ध्यान नहीं रखते और रोगों से घिरते चले जाते हैं।
सप्तम भाव का वक्री गुरु अपने जीवनसाथी के प्रति ज्यादा विश्वस्त नहीं होते। ये आत्मकेंद्रित ज्यादा होते हैं और व्यक्तिगत सुख के अलावा इन्हें किसी दूसरे की परवाह नहीं होती। ऐसे जातक कंजूस प्रवृत्ति के होते हैं। हालांकि कई बार सप्तमस्थ वक्री गुरु वाला जातक विवाह के बाद नौकरी में उच्च पद हासिल करता है।
अष्टम भाव में वक्री गुरु जातक को रहस्यमयी व्यक्तित्व देता है। ऐसा व्यक्ति तंत्र-मंत्र, जादू टोने में विश्वास रखता है। इस जातक का कोई कार्य सीधे तरीके से नहीं होता और कार्यों का अंत भी बेहद बुरी तरह से होता है। यदि आठवां गुरु वक्री हो और शुभ ग्रहों से युक्त हो तो जातक को पैतृक धन संपत्ति मिलती है।
नवम भाव धर्म और भाग्य स्थान होता है। इस भाव में गुरु वक्री होने पर जातक धर्मभीरू और धर्मांध होता है। ऐसे जातक अपनी व्यक्तिगत मान्यताएं बना लेते हैं| ये सामाजिक कार्यों में तभी रुचि लेते हैं जब उसमें इनका कोई व्यक्तिगत हित हो।
दशम स्थान कार्य स्थान होता है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली के दशम स्थान में वक्री गुरु हो तो उसकी विरोधी गतिविधियां ही उसके कार्य में बाधक बनती है। जातक के कमजोर निर्णय, गैर जिम्मेदार हरकतें खुद के परिवार की निगाह में ही गिरा देती है। ऐसे जातक नौकरी में रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं।
जिस जातक की जन्मकुंडली के 11वें स्थान में गुरु वक्री होकर बैठा हो उसकी दोस्ती निन्म स्तरीय लोगों से होती है।
द्वादश स्थान में वक्री गुरु हो तो जातक अवसरों को ठीक समय पर पहचान नहीं पाता और कई बार अच्छे मौके हाथ से छूट जाते हैं। ये अपना धन, समय और श्रम बेकार के कार्यों में नष्ट करते रहते हैं।
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