बंगाल का रहस्यमयी सिद्धेश्वरी काली मंदिर! | अंबिका कालना का 400 साल पुराना इतिहास
Spiritual awakening
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बंगाल का रहस्यमयी सिद्धेश्वरी काली मंदिर! | अंबिका कालना का 400 साल पुराना इतिहास
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“एक ऐसा काली मंदिर, जहाँ साल में कई दिनों तक माँ को बिना वस्त्रों के रखा जाता है और मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं!
आखिर क्या है इस रहस्यमयी परंपरा के पीछे की कहानी? 😱”
बंगाल का एक ऐसा काली मंदिर, जिसके पीछे छिपा है सदियों पुराना रहस्य!
पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्धमान जिले में भागीरथी नदी के किनारे बसा है ऐतिहासिक शहर अंबिका कालना, जिसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है।
कहा जाता है कि इस शहर का नाम माँ अंबिका या सिद्धेश्वरी के नाम पर पड़ा।
यहाँ स्थित माँ सिद्धेश्वरी काली का मंदिर कालना के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है।
लोककथा के अनुसार, लगभग 1600 ईस्वी या उससे पहले, इस इलाके में घने जंगल और श्मशान हुआ करते थे।
इसी जंगल में अंबरीश नाम के एक तांत्रिक साधक को बरगद के पेड़ के नीचे एक रहस्यमयी घट मिला था।
उन्होंने उस घट की स्थापना करके साधना शुरू की और माँ की उपासना में लीन हो गए।
हैरानी की बात यह है कि कई पीढ़ियों तक यहाँ माँ की पूजा किसी मूर्ति से नहीं, बल्कि उसी पवित्र घट से होती रही!
बाद में स्वप्नादेश के अनुसार नीम की लकड़ी से माँ की मूर्ति बनाई गई।
लेकिन इस मंदिर की सबसे रहस्यमयी परंपरा अभी बाकी है!
कोजागरी पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की पंचमी से लेकर त्रयोदशी तक माँ को दिगंबरी रूप में रखा जाता है और मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं।
फिर भूत चतुर्दशी की शाम 7 बजे से रात 12 बजे तक माँ के इस विशेष स्वरूप के दर्शन होते हैं। इसके बाद माँ को वस्त्र पहनाकर पूजा शुरू की जाती है।
मंदिर से जुड़ी एक पुरानी लोककथा में डाकुओं और नरबलि का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि इसी परंपरा की स्मृति में आज डाब यानी नारियल की बलि दी जाती है।
एक प्राचीन घट, नीम की लकड़ी की मूर्ति और सदियों पुरानी तांत्रिक परंपरा…
क्या आपने इससे पहले ऐसे अनोखे काली मंदिर के बारे में सुना था?
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