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Jyotiba Phule | सत्यशोधक समाज | inspiring Stories

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Jyotiba Phule | सत्यशोधक समाज | inspiring Stories

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19वीं सदी का भारत अज्ञानता, जातिवाद और छुआछूत की बेड़ियों में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। ऐसे अंधकारमय समय में महाराष्ट्र की धरती पर एक ऐसा सूर्य उदित हुआ, जिसने समाज के शोषित और वंचित वर्ग को शिक्षा और समानता की नई किरण दी। इस महान आत्मा का नाम था— ज्योतिराव गोविंदराव फुले, जिन्हें दुनिया 'महात्मा ज्योतिबा फुले' के नाम से जानती है। सन् 1827 में एक साधारण माली परिवार में जन्मे ज्योतिबा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। लेकिन समाज की कड़वी सच्चाई से उनका सामना तब हुआ, जब वे अपने एक उच्च जाति के मित्र की शादी में गए। वहां उनकी जाति को लेकर उन्हें बुरी तरह अपमानित किया गया और बारात से बाहर निकाल दिया गया। यह अपमान किसी भी साधारण व्यक्ति को अंदर से तोड़ सकता था, लेकिन ज्योतिबा कोई साधारण इंसान नहीं थे। इस घटना ने उनके भीतर एक ज्वाला भड़का दी—समाज से ऊंच-नीच और जातिवाद के इस ज़हर को हमेशा के लिए मिटाने की ज्वाला। उन्होंने थॉमस पेन की प्रसिद्ध पुस्तक 'राइट्स ऑफ मैन' पढ़ी और यह गहराई से समझ गए कि किसी भी समाज की कुरीतियों को जड़ से मिटाने का एकमात्र हथियार 'शिक्षा' है। उनका मानना था कि अज्ञानता ही सभी दुखों का मूल कारण है, विशेषकर महिलाओं और दलितों के लिए, जिन्हें उस समय शिक्षा से पूरी तरह वंचित रखा गया था। उन्होंने एक प्रसिद्ध नारा दिया था: "विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र गए—इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।" ज्योतिबा जानते थे कि केवल उपदेश देने से समाज नहीं बदलता, बदलाव की शुरुआत स्वयं करनी पड़ती है। सावित्रीबाई की शिक्षा: उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ना-लिखना सिखाया, ताकि वे अन्य महिलाओं को शिक्षित कर सकें। 1848 में, दोनों ने मिलकर पुणे के भिड़े वाडा में लड़कियों के लिए देश का पहला स्कूल खोला। यह कोई आसान काम नहीं था। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो रूढ़िवादी लोग उन पर पत्थर, गोबर और कीचड़ फेंकते थे। लेकिन ज्योतिबा एक चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। उन्होंने समाज के तानों, विरोध और धमकियों की परवाह किए बिना अपना मिशन जारी रखा। ज्योतिबा का हृदय करुणा से भरा था। उस दौर में जब अछूतों को सार्वजनिक कुओं से पानी पीने का अधिकार नहीं था, तब उन्होंने अपने घर का पानी का टैंक (हौद) उनके लिए खोल दिया। यह उस समय का एक बहुत ही क्रांतिकारी और साहसिक कदम था। समाज को सत्य और न्याय का मार्ग दिखाने के लिए 24 सितंबर 1873 को उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' (सत्य की खोज करने वाला समाज) की स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य निचली जातियों और महिलाओं को शोषण से मुक्त कराना और उन्हें उनके बुनियादी मानवीय अधिकार दिलाना था। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव, शोषितों के प्रति प्रेम और अदम्य साहस को देखकर ही 1888 में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित किया गया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने न केवल अपने समय की बेड़ियों को तोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया, जिस पर चलकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे महान विचारकों ने एक समतामूलक और लोकतांत्रिक भारत के संविधान की नींव रखी। ज्योतिबा फुले का जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर इरादे नेक हों और हौसला बुलंद हो, तो एक अकेला व्यक्ति भी सदियों पुरानी व्यवस्था को बदल सकता है।