'आगम शास्त्र' और 'तंत्र शास्त्र' के ग्रंथों से उद्धृत ' । श्री प्रत्यंगिरा अष्टोत्तर शत नामावली
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'आगम शास्त्र' और 'तंत्र शास्त्र' के ग्रंथों से उद्धृत ' । श्री प्रत्यंगिरा अष्टोत्तर शत नामावली
माँ प्रत्यंगिरा की महिमा और उनके इस विशेष स्तोत्र की जानकारी जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही कल्याणकारी भी है।
✨ हर शब्द को अपनी आवाज़ में संजोकर, मैंने इस स्तोत्र को आपके लिए जीवंत किया है।
🔥 यह केवल पाठ नहीं… मेरी आवाज़ में जागृत दिव्य शक्ति है!
(👉 Declaration: music style etc made with the help of AI tools)
1. मूल ग्रन्थ और स्रोत (Origin & Text)
ग्रन्थ: श्री प्रत्यंगिरा अष्टोत्तर शत नामावली मुख्य रूप से 'आगम शास्त्र' और 'तंत्र शास्त्र' के ग्रंथों से उद्धृत है। विशेष रूप से इसका उल्लेख 'मेरु तंत्र' और 'शाक्त प्रमोद' जैसे तंत्र प्रधान ग्रंथों में मिलता है।
लेखक: शास्त्रानुसार, अधिकांश स्तोत्रों और नामावलियों के दृष्टा ऋषि भगवान शिव (महादेव) स्वयं माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने ही माता पार्वती को इन गुप्त विद्याओं का ज्ञान दिया था।
माता प्रत्यंगिरा का स्वरूप
माता प्रत्यंगिरा को 'अथर्वण भद्रकाली' भी कहा जाता है। इनका स्वरूप अद्भुत है:
1) इनका मुख सिंह (Lion) का है और शरीर स्त्री का।
2) इन्हें भगवान नरसिंह की शक्ति के क्रोध को शांत करने वाली और साथ ही शिव के शरभ
अवतार की शक्ति माना जाता है।
3) इनका गहरा नीला/काला रंग 'शून्यता' और 'अनंत शक्ति' का प्रतीक है।
3. स्तोत्र का महत्व (Significance)
इस नामावली के 108 नाम माता की शक्तियों के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
(1) अभिचार कर्म निवारण: यदि किसी पर काला जादू, तंत्र-मंत्र या 'मूठ' (अभिचार) का प्रयोग किया गया हो, तो प्रत्यंगिरा नामावली उसे जड़ से खत्म कर देती है।
(2) शत्रु विजय: यह स्तोत्र शत्रुओं की बुद्धि को कुंठित करने और उनसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए अचूक माना जाता है।
(3) नकारात्मकता का नाश: घर में क्लेश, नजर दोष (Evil Eye) या अज्ञात भय को दूर करने में यह अत्यंत प्रभावशाली है।
(4) शीघ्र फलदायी: तंत्र शास्त्र में माना जाता है कि प्रत्यंगिरा देवी की साधना अन्य साधनाओं की तुलना में बहुत तीव्र फल देती है।
प्रत्यंगिरा देवी केवल 'क्रोध' की देवी नहीं हैं। 'प्रति' और 'अंगिरा' का अर्थ होता है - जो हर अंग और हर दिशा से आपकी रक्षा करे। यह नामावली साधक के भीतर के आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को भी भस्म करती है।
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