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मैंने मांग ली रिहाई | नज़रें उठा के मुर्शिद ने मुझसे नज़रें मिलायी | Sufi Qawwali | Anand Rathore

POOR TRANSLATION

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मैंने मांग ली रिहाई | नज़रें उठा के मुर्शिद ने मुझसे नज़रें मिलायी | Sufi Qawwali | Anand Rathore

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POOR TRANSLATION
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मैंने मांग ली रिहाई नज़रें उठा के मुर्शिद ने मुझसे नज़रें मिलायी, और मैंने मांग ली रिहाई। किस चीज़ से रिहाई? हस्ती के इस फ़रेब से, इस दुनिया की कैद से, उस “मैं” से, जो खुद को सबसे अलग समझता रहा। जब मुर्शिद की नज़र पड़ती है, तो शायद कुछ माँगने को बचता ही नहीं। न जन्नत की तलब रहती है, न दोज़ख़ का डर। ग़म और ख़ुशी, सही और ग़लत, इन सबके पार एक ऐसा सफ़र शुरू होता है जहाँ धीरे-धीरे कतरा दरिया में और दरिया समंदर में खोने लगता है। “धीरे धीरे खो रहा है, दरिया समंदर हो रहा है…” और फिर बस एक ही दुआ रह जाती है— “अपनी नज़रों के नूर के दरिया में डूब जाने दो, मुझे डूब के उस पार उतर जाने दो…” Music is not being created. It is being received. The words and the tune simply appeared. I only listened, and set down as much as I could understand. Written & Received by: Anand Rathore Composed by: Anand Rathore with AI POOR TRANSLATION. Anand Rathore • I&AI