श्रीराम नामकरण संस्कार | Ramcharitmanas Balkand 196 to 198 | सो सुख धाम राम अस नामा
भक्ति, भजन, कीर्तन और कथाएँ
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श्रीराम नामकरण संस्कार | Ramcharitmanas Balkand 196 to 198 | सो सुख धाम राम अस नामा
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श्रीरामचरितमानस: बालकाण्ड (दोहा 196 से 198)
इस प्रसंग में चारों राजकुमारों—श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जी के नामकरण संस्कार का वर्णन है। गुरु वशिष्ठ जी महाराज दशरथ के चारों पुत्रों के नामकरण का अर्थ बताते हैं:
श्रीराम: जो स्वयं आनंद के सिंधु और सुख की राशि हैं, जिनके एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं और जो संपूर्ण जगत को विश्राम देने वाले हैं।
भरत: जो समस्त विश्व का भरण-पोषण करने वाले हैं।
शत्रुघ्न: जिनके केवल स्मरण मात्र से शत्रुओं का नाश हो जाता है।
लक्ष्मण: जो शुभ लक्षणों के धाम, श्रीराम के परम प्रिय और समस्त जगत के आधार हैं।
इसके साथ ही चारों भाइयों का परस्पर प्रेम और माता कौशल्या की गोद में निर्गुण-निराकार परब्रह्म के सगुण बाल रूप का दर्शन वर्णित है।
Shrimad Ramcharitmanas: Balkand (Doha 196 to 198)
This sacred section highlights the divine naming ceremony (Naamkaran Sanskar) of the four princes:
The Naming Ceremony: Sage Vashistha reveals the spiritual significance behind the names of Shri Ram, Bharata, Shatrughna, and Lakshmana.
Jo Anand Sindhu Sukh Rasi: Lord Rama as the infinite ocean of bliss who grants peace and liberation to all realms.
Brotherly Devotion: The eternal bond between Lakshmana and Shri Ram, and Bharata and Shatrughna.
Bhakti & Leela: The all-pervading, formless Brahman playfully resting in the lap of Mother Kaushalya, bound entirely by pure love and devotion.
LYRICS (Ramcharitmanas - Balkand - Doha 196 to 198)
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस ,
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसीदास के ईस .
कछुक दिवस बीते एहि भाँती , जात न जानिअ दिन अरु राती .
नामकरन कर अवसरु जानी , भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी .
करि पूजा भूपति अस भाषा , धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा .
इन्ह के नाम अनेक अनूपा , मै नृप कहब स्वमति अनुरूपा .
जो आनंद सिंधु सुख रासी , सीकर तें त्रैलोक सुपासी .
सो सुख धाम राम अस नामा , अखिल लोक दायक बिश्रामा .
बिश्व भरन पोषन कर जोई , ताकर नाम भरत अस होई .
जाके सुमिरन तें रिपु नासा , नाम सत्रुहन बेद प्रकासा .
लच्छन धाम राम प्रिय , सकल जगत आधार ,
गुरु बसिष्ठ तेहि राखा , लछिमन नाम उदार .
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी , बेद तत्व नृप तव सुत चारी .
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना , बाल केलि रस तेहिं सुख माना .
बारेहि ते निज हित पति जानी , लछिमन राम चरन रति मानी .
भरत सत्रुहन दूनउ भाई , प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई .
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी , निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी .
चारिउ सील रूप गुन धामा , तदपि अधिक सुखसागर रामा .
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा , सूचत किरन मनोहर हासा .
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना , मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना .
व्यापक ब्रह्म निरंजन , निर्गुन बिगत बिनोद .
सो अज प्रेम भगति बस , कौसल्या के गोद .
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