जहाँ प्रेम की मस्ती होती है, वहां नियम धरम नहीं है बाबा ...
सनातन स्वर
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जहाँ प्रेम की मस्ती होती है, वहां नियम धरम नहीं है बाबा ...
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सनातन स्वर
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आध्यात्मिक प्रेम की स्थिति बहुत विचित्र है। ये प्रेम वर्णन से परे है। अतः इस स्थिति से शब्द और भाव भी थोड़े विचित्र प्रकट होते हैं। ये भजन ऐसी ही स्थिति में प्रेम का प्रकटीकरण है।
साधक को गुरु द्वारा जब आत्मज्ञान होता है उसे पता चलता है वो शरीर, मन, बुद्धि, भाव विचार इत्यादि का साक्षी है। ये साक्षी सदा शुद्ध, बुद्ध, चेतन और मुक्त है। आनंद और प्रेम स्वरुप है। ये स्थिति नियम और धर्म से परे है। ये आध्यात्मिक प्रेम की स्थिति बहुत विचित्र है। ये प्रेम वर्णन से परे है। ये चेतना का चेतना से प्रेम है, एक अनुनाद है। जबकि सांसारिक प्रेम शरीर का शरीर भाव से प्रेम होता है।
ये गीत इसी शुद्ध प्रेम का प्रकटीकरण है।