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"पाहुडदोहा" मुनि रामसिंह कृत, अपभ्रंशकाव्य शैली, व्या.-पार्ट-96, डॉ वीरसागर जैन, नई दिल्ली -07.09.26

Sudhesh Jain

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"पाहुडदोहा" मुनि रामसिंह कृत, अपभ्रंशकाव्य शैली, व्या.-पार्ट-96, डॉ वीरसागर जैन, नई दिल्ली -07.09.26

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पुनरावृत्ति दोहा क्रमांक 198 से 204 तक दोहा क्रमांक 205 से 204 तक विशेष भावार्थ, जिणवरु झायहि जीव तुहु, विसयकसायहँ खोइ । दुक्खु ण देक्खहि कहिं मि वढ, अजरामरु पउ होइ ।।198।। अर्थ- हे जीव ! तू विषय-कषाय को छोड़कर जिनवर को ध्या | इससे तुझे कभी भी दुःख देखने नहीं मिलेगा और अजरामर पद की प्राप्ति होगी | विसयकसाय चएवि वढ, अप्पहँ मणु वि धरेहि । चूरिवि चउगइ णित्तुलउ, परमप्पउ पावेहि ।।199।। अर्थ- हे मूर्ख ! तू विषय-कषाय को छोड़कर आत्मा में मन को धारण कर, इससे तू चारों गतियों का नाश करके अतुल परम पद को प्राप्त करेगा | इंदियपसरु णिवारि वढ, मण जाणहि परमत्थु । अप्पा मेल्लिवि णाणमउ, अवरु विडावइ सत्थु।200। अर्थ- हे मूर्ख ! मन और इन्द्रियों का प्रसार रोककर परमार्थ को जानो, रक ज्ञानमय आत्मा को छोड़कर अन्य सब शास्त्रों की लीला है | विसया चिंति म जीव तुहु, विसय ण भल्ला होंति । सेवंताहँ वि महुर वढ, पच्छइँ दुक्खइँ दिंति ।।201।। अर्थ- हे जीव ! तू विषयों का चिन्तन मत कर, ये विषय अच्छे नहीं होते हैं, सेवन करते समय तो मधुर लगते हैं लेकिन बाद में दुःख देते हैं | विसयकसायहँ रंजियउ, अप्पहिं चित्तु ण देह । बंधिवि दुक्कियकम्मडा, चिरु संसारु भमेइ ।।202।। अर्थ- विषय-कषायों में रंजित यह जीव अपने चित्त को आत्मा में नहीं लगाता है और बुरे कर्मों को बाँधकर चिर काल तक संसार में भ्रमण करता है | इंदियविसय चएवि वढ, करि मोहहँ परिचाउ । अणुदिणु झावहि परमपउ, तो एहउ ववसाउ ।।203।। अर्थ- हे मूर्ख ! इन्द्रिय-विषयों का त्याग करके मोह का त्याग कर और प्रतिदिन परमपद का ध्यान कर, यही पुरुषार्थ है | णिज्जियसासो णिप्फंदलोयणो मुक्कसयलवावारो । एयाइं अवत्थ गओ सो जोयउ णत्थि संदेहो ।।204।। अर्थ- जिसने श्वास को जीत लिया है, जिसके लोचन निष्पन्द हो गये हैं और जिसका सकल व्यापार रुक गया है ऐसी अवस्था को प्राप्त जीव योगी है इसमें कोई सन्देह नहीं | तुट्टे मणवावारे, भग्गे तह रायरोससब्भावे । परमप्पयम्मि अप्पे, परिट्ठिए होइ णिव्वाणं ।।205।। अर्थ- मन का व्यापार टूटने पर, राग-द्वेष की सत्ता समाप्त होने पर तथा परमपद आत्मा परिस्थित होने पर निर्वाण की प्राप्ति होती है |