कड़वे प्रवचन | SB.7.9.45 | LIVE ISKCON NVCC Pune | HG Mohanrupa Prabhuji
Mohan Rupa Das
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ŚB 7.9.45
यन्मैथुनादिगृहमेधिसुखं हि तुच्छं
कण्डूयनेन करयोरिव दु:खदु:खम् ।
तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदु:खभाज:
कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीर: ॥ ४५ ॥
yan maithunādi-gṛhamedhi-sukhaṁ hi tucchaṁ
kaṇḍūyanena karayor iva duḥkha-duḥkham
tṛpyanti neha kṛpaṇā bahu-duḥkha-bhājaḥ
kaṇḍūtivan manasijaṁ viṣaheta dhīraḥ
विषयी जीवन की तुलना खुजली दूर करने हेतु दो हाथों को रगड़ने से की गई है। गृहमेथी अर्थात् तथाकथित गृहस्थ जिन्हें कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, सोचते हैं कि यह खुजलाना सर्वोत्कृष्ट सुख है, यहापि वास्तव में यह दुख का मूल है। कृपण जो ब्राह्राणों से सर्वथा विपरीत होते हैं, बारम्बार ऐन्द्रिय भोग करने पर भी तुष्ट नहीं होते। किन्तु जो धीर हैं और इस खुजलाहट को सह लेते हैं उन्हें मूर्खी तथा धूर्तों जैसे कष्ट नहीं सहने पड़ते।
तात्पर्य :
भौतिकतावादी सोचते हैं कि इस संसार का सबसे बड़ा सुख विषयासक्ति है, अतएव वे अपनी इन्द्रियों को, विशेष रूप से कामेन्द्रियों को, तुष्ट करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं। ऐसा सामान्यतया सर्वत्र और विशेष रूप से पाक्षात्य जगत में पाया जाता है जहाँ विषयी जीवन की तुष्टि के लिए विभिन्न प्रकार के नियमित प्रबन्ध होते हैं। किन्तु तथ्य यह है कि इससे कोई सुखी नहीं हो पाया है। यहाँ तक कि वे हिप्पी भी, जिन्होंने अपने बाप-दादों के भौतिक सुखों का परित्याग कर दिया है. विषयी जीवन के सनसनीखेज सुख नहीं त्याग सकते। ऐसे लोगों को वहाँ पर कृपण कहा गया है। यह मनुष्य-जीवन एक महान् निधि है, क्योंकि इसी जीवन में मनुष्य अपने जीवन-लक्ष्य को पूरा कर सकता है। किन्तु दुर्भाग्यवश शिक्षा तथा संस्कृति के अभाव में लोग विषयी जीवन के मिथ्या सुख के शिकार बनाये जाते हैं। इसीलिए प्रह्लाद महाराज यह उपदेश देते हैं कि इस इन्द्रियतृप्ति की सभ्यता से, विशेष रूप से विषयी जीवन से, भ्रमित न हुआ जाये। मनुष्य को गम्भीर होना चाहिए, इन्द्रियतृप्ति से बचना चाहिए और कृष्णभावनाभावित होना चाहिए। इस के उल्ट कंजूस के समान ही कामी पुरुष कभी भी इन्द्रियत्ति से सुख-लाभ नहीं कर पाता। प्रकृति के प्रभाव से बच पाना दुष्कर है किन्तु जैसाकि कृष्ण ने भगवद्गीता (७.१४) में कहा है- मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते-यदि कोई स्वेच्छा से कृष्ण के चरणकमलों में आत्मसमर्पण करता है, तो वह आसानी से बच सकता है।
विषयी जीवन के निम्नकोटिक सुख के विषय में यामुनाचार्य कहते हैं-
यदावधि मम चेतः कृष्णपदारविन्दे नव-नवरसधामनुद्यत रन्तुमासीत्। तदावधि बत नारीसङ्गमे स्मर्यमाणे,
भवति मुखविकारः सुष्टु निष्ठीवनं च।
"चूंकि मैं कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगाया गया हूँ और उन्हीं में नया-नया आनन्द पाता रहा हूँ, अतएव जब भी में विषय-सुख के बारे में सोचता हूँ तभी इस विचार पर थूकता हूँ और मेरे होंठ अरुचि से विकृत हो जाते हैं।" यामुनाचार्य पहले एक बड़े राजा थे जिन्होंने अनेक प्रकार का ऐन्द्रिय सुख भोगा था, किन्तु जब बाद में वे भगवान् की सेवा में रत हुए तो उन्हें आध्यात्मिक आनन्द मिला और विषयी जीवन के विचार पर घृणा होने लगी। यदि विषय-विचार उनके मन में आता भी तो वे घृणा से उस पर थूक देते थे।