क्षमा भाव सुखकारी - उत्तम क्षमा भजन | Kshama Bhaav Sukhkaari | ब्र. रवीन्द्रजी | आत्मन् धर्म सौरभ
Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
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क्षमा भाव सुखकारी - उत्तम क्षमा भजन | Kshama Bhaav Sukhkaari | ब्र. रवीन्द्रजी | आत्मन् धर्म सौरभ
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क्षमा भाव सुखकारी, निज स्वभाव अविकारी ।
वस्तुस्वरूप विचारो, नहीं अनिष्ट चितारो । १
हो परिणमन स्वतंत्र, क्यों होकर परतंत्र ?
क्रोध अग्नि में जलते, नहीं स्वरूप समझते । २
एक कार्य में होते, अनेक कारण भाई ।
तत्त्वदृष्टि से देखो, दोषदृष्टि दुःखदाई । ३
कर्मों के हैं प्रेरे, जग में जीव घनेरे ।
नहीं क्षोभ तुम करना, दया भाव उर धरना । ४
यदि नहीं माने तो भी, माध्यस्थ ही रहना ।
उपसर्ग और परीषह, साम्यभाव से सहना । ५
भिन्न ज्ञेय हैं सब ही, तुम ज्ञाता भगवान ।
रहो सहज ही ज्ञाता, बन जाओ भगवान । ६
(क्षमा- बालभावना, पृष्ठ १२)
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रचयिता - श्रद्धेय ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्वर - वंदना पारिख, राजनांदगाँव
सहस्वर - अनामिका चोरडिया, राजनांदगाँव
संगीत - विलास स्टूडियो, राजनांदगाँव
प्रस्तुतकर्ता - आत्मन् परिवार, सम्मेदशिखरजी