रिश्तों में हर बात का हिसाब रखने लगें… तो अपनापन कहाँ रह जाता है? | Jeevan Ki Ankahi Baatein
अनकही बातें
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रिश्तों में हर बात का हिसाब रखने लगें… तो अपनापन कहाँ रह जाता है? | Jeevan Ki Ankahi Baatein
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किसने पहले फोन किया…
कौन मिलने आया…
किसने कितना किया…
और किसने कितना लौटाया…
बिना महसूस किए, कभी-कभी हम रिश्तों में भी छोटी-छोटी बातों का हिसाब रखने लगते हैं।
हिसाब रखना गलत नहीं है। ज़िंदगी में समय, पैसे और ज़िम्मेदारियों का हिसाब ज़रूरी है। लेकिन शायद कुछ चीज़ों की खूबसूरती इसी में है कि उन्हें करते समय हमने ये नहीं सोचा—बदले में क्या मिलेगा।
अपनेपन में हर दिन बराबर हिस्सा नहीं होता।
कभी कोई हमारे लिए थोड़ा ज़्यादा करता है…
कभी हम किसी के लिए।
और शायद अच्छे रिश्तों की सहजता वहीं बची रहती है, जहाँ हर छोटी बात दर्ज नहीं की जाती।
उम्र के साथ हिसाब सीखना ज़रूरी है…
लेकिन समझदारी शायद ये जानने में है कि हिसाब कहाँ नहीं रखना है।
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