भानामती ने पुत्र मोह त्याग कर प्रद्युम्न पर किया रसायन विद्या का प्रयोग | Shri Krishna Jeevani
Tilak
0:00 / 0:00
भानामती ने पुत्र मोह त्याग कर प्रद्युम्न पर किया रसायन विद्या का प्रयोग | Shri Krishna Jeevani
31 612 просмотров · 7 дн. назад
Tilak
40,6 млн подписчиков
31 612 просмотров · 7 дн. назад
पुत्र के वात्सल्य सुख के मोह में फंसी भानामती प्रद्युम्न को बड़ा करने की बात सोच कर विचलित हो जाती है, जिससे उसे रात्रि को नींद नहीं आती है। यह देख पुनः देवी रति भानामती को सावधान कराने के लिए उसके कक्ष में जाकर उससे कहती है कि शम्बरासुर के गुरुदेव प्रद्युम्न की हत्या के लिए यज्ञ कर रहे है। यह सुन भानामती कहती है कि मैं अपने पुत्र की रक्षा के लिए अपनी मायावी विद्याओं का प्रयोग करूँगी। देवी रति कहती है कि अच्छा तो यही होगा कि तुम अपनी रसायन विद्या से प्रद्युम्न को तुरन्त युवा बनाकर अपनी और उसकी रक्षा करो, क्योंकि तुम्हारी शक्ति और गुरुदेव की शक्ति में आकाश-पाताल का अंतर है। पुत्र मोह में डूबी भानामती कुछ भी समझना नहीं चाहती है। यह देख देवी रति भानामती को प्रणाम कर वापस चली जाती है। अपनी दिव्य दृष्टि से यह दृश्य देख चिंतित देवी रुक्मिणी से श्रीकृष्ण कहते है कि अब हमें भानामती को पुत्र मोह के चक्रव्यूह से बाहर निकाल कर उसे याद दिलाना है कि उसने वचन दिया था कि वो मायावी तथा रसायन विद्या का प्रयोग त्रिलोक के कल्याण के लिए ही करेगी और अब वो समय आ गया है। श्रीकृष्ण देवी रुक्मिणी के साथ भानामती के कक्ष में प्रकट होते है और उसे वातावरण में गूँज रही गुरुदेव के मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनाते हुए समझाते है कि इस यज्ञ से प्राप्त होने वाले अमृत से शम्बरासुर प्रद्युम्न की मृत्यु बन जाएगा। इसलिए त्रिलोक के कल्याण के लिए अपनी ममता की भेंट चढ़ा दो, क्योंकि प्रद्युम्न भगवान विष्णु के एक रूप कामदेव का ही एक रूप है। प्रद्युम्न की सत्यता जानकर भानामती को अपनी भूल का आभास हो जाता है और वह श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के अंतर्धान होते ही प्रद्युम्न को बड़ा करने से पहले अंतिम बार अपना सारा मातृ प्रेम बालक प्रद्युम्न पर लुटाने लगती है। त्रिलोक के कल्याण के लिए कालचक्र की गति को तेज करने जा रही भानामती को स्वयं ब्रह्मा जी, भगवान विष्णु और भगवान विष्णु आशीर्वाद देने के लिए प्रकट होते है। भानामती प्रद्युम्न को युवा बनाने के लिए यज्ञ करना प्रारम्भ कर देती है, जिसका आभास यज्ञ कर रहे गुरुदेव को हो जाता है और वह उसी समय भानामती को सामने प्रकट होकर उसे विद्रोही कहते हुए फटकार लगाते है। भानामती उनसे कहती है कि वह शम्बरासुर जैसे अधर्मी का साथ छोड़कर सत्य और धर्म का मार्ग अपनाएं। यह सुन गुरुदेव भड़कते हुए कहते है कि यदि तुमने इसे नष्ट नहीं किया तो मैं इसे नष्ट कर दूँगा। यह कह गुरुदेव बालक प्रद्युम्न पर मंत्रोच्चार से प्रकट अग्नि से प्रहार करते है, जिसे भानामती अपनी मायावी शक्ति से नष्ट कर देती है। गुरुदेव बार-बार यह प्रयास करते है, लेकिन हर बार उनका प्रयास विफल हो जाता है, यहाँ तक बाणों का प्रहार भी। अंततः पराजित गुरुदेव अपने यज्ञ स्थल पर लौटकर पुनः यज्ञ करने लगते है। यह देख कालपुरुष गुरुदेव का उपहास उड़ाते हुए कहता है कि जब आप अमर नहीं है तो आप शम्बरासुर को कैसे अमरत्व प्रदान कर सकते है। लेकिन अहंकारी गुरुदेव इस हार को स्वीकार ही नहीं करना चाहते है। वही प्रद्युम्न के बड़ा होने में आ रही बाधाओं से चिंतित देवी रति को नारद मुनि समझाते है कि भानामती को इस प्रक्रिया को पूर्ण करने में अभी थोड़ा समय और लगेगा क्योंकि चमत्कारी कुण्ड से रसायन प्रकट होने में समय लगता है। वही जहाँ एक ओर शम्बरासुर अपनी मृत्यु के आभास से डरा हुआ है, तो वही दूसरी ओर श्रीकृष्ण मृत्यु की विस्तृत व्याख्या देवी रुक्मिणी को सुनाकर उनकी जिज्ञासा शांत करते है। भानामती के यज्ञ के प्रसन्न होकर यक्षराज, गंधर्वराज और नागराज प्रकट होते है और उससे कहते है कि उसे सबसे पहले सात पवित्र नदियों के जल से स्नान कराना होगा। भानामती भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती है कि वह उसकी सहायता करें। श्रीकृष्ण उसकी इस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए देवी गंगा, देवी गोदावरी, देवी सरस्वती, देवी यमुना, देवी कावेरी, देवी नर्मदा और देवी कृष्णा को आदेश देते है कि वे प्रद्युम्न को स्नान कराएं। सभी नदियाँ प्रकट होकर अपने जल से प्रद्युम्न को स्नान कराती है। उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मा जी से युवा प्रद्युम्न के गुरु पद स्वीकार करने का अनुरोध करते है क्योंकि उन्हें लगता है कि रसायन विद्या से प्रद्युम्न युवा तो बन जाएगा लेकिन कही उसकी प्रज्ञा एक बालक जैसी ही न रह जाए।
सम्पूर्ण जगत में भगवान विष्णु के आठवें अवतार एवं सोलह कलाओं के स्वामी भगवान श्री कृष्ण काजीवन धर्म, भक्ति, प्रेम, और नीति का अद्भुत संगम है। वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में कारागार में जन्म लेकर गोकुल की गलियों में यशोदा और नंदबाबा के यहाँ पलने वाले, अपनी लीलाओं, जैसे पूतना वध, माखन चोरी, राधा के संग प्रेम, गोपियों के साथ रासलीला और कालिया नाग के दमन के लिए प्रसिद्ध श्री कृष्ण ने युवावस्था में मथुरा कंस का वध करके जनमानस को उसके अत्याचार से मुक्त कराया एवं स्वयं के लिए द्वारका नगरी स्थापना भी की। उनका जीवन केवल लीलाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने समाज को धर्म और कर्म का गूढ़ संदेश देने के लिए महाभारत के युद्ध में पांडवों का मार्गदर्शन किया और अर्जुन के सारथी बनकर उसे "श्रीमद्भगवद्गीता" का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन की समस्याओं का समाधान बताने वाला महान ग्रंथ माना जाता है। श्री कृष्ण का जीवन प्रेम, त्याग, और नीति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। आपका प्रिय चैनल "तिलक" श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ा यह विशेष संस्करण "श्री कृष्ण जीवनी" आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी कथाओं का संकलन किया गया है। भक्ति भाव से इनका आनन्द लीजिए और तिलक से जुड़े रहिए।
#tilak #krishna #shreekrishna #shreekrishnajeevani #krishnakatha