अनित्य का दर्शन होते ही ‘मैं’ की पकड़ ढीली पड़ती है क्या? | जैन अनित्य भावना | सहज आत्म-अवलोकन
ARYA MAITRI PRESENCE
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अनित्य का दर्शन होते ही ‘मैं’ की पकड़ ढीली पड़ती है क्या? | जैन अनित्य भावना | सहज आत्म-अवलोकन
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🙏 णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं।
मैं जैसा अभी हूँ… क्या एक क्षण पहले भी बिल्कुल वैसा ही था?
मेरा शरीर बदल रहा है क्या?
मेरी भावना बदल रही है क्या?
मेरे विचार बदल रहे हैं क्या?
मेरा बोलना और व्यवहार भी बदलता दिखाई देता है क्या?
मैं बदल रहा हूँ—यह केवल मान रहा हूँ, या प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है?
और जब परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई देता है…
“मैं ऐसा ही हूँ” की पकड़ में कुछ हो रहा है क्या?
पकड़ ढीली करनी पड़ रही है…
या देखने के साथ अपने-आप कुछ बदल रहा है क्या?
यही इस सहज श्रवण अभ्यास का केंद्र है—जैन दर्शन की अनित्य भावना को केवल मानना नहीं, बल्कि अपने वर्तमान अनुभव में परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई देता है क्या, इसे देखना।
🎧 कुछ न करना… केवल सुनना… बहुत कुछ?
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कमेंट में:
“मैं बदल रहा हूँ—यह मैंने माना, या मुझे दिखाई दिया?”
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