#706. आत्मा असमर्थ उपादान कारण का आनंद/ 11.09 दोपहर/ त्यागी विद्यालय
Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
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#706. आत्मा असमर्थ उपादान कारण का आनंद/ 11.09 दोपहर/ त्यागी विद्यालय
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Baal Br. Pt. Sumat Prakash Ji
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राग हो क्यों इसे सुन तू प्यारे।
ये तो परलक्ष्य के हैं सहारे ।।1।।
दोष इसमें तो पर का नहीं है।
जीव अज्ञान कारण सही है।। 2।।
पर में आत्मा कभी भी न जाता ।
आतमा में भी पर तो न आता ।। 3 ।।
जीव होता स्वयं ही विकारी।
दोष पर को देना भूल भारी ।। 4।।
फिर भी राग स्वभाव नहीं है।
ज्ञान जैसा स्वकार्य नहीं है।।5।।
ज्ञान में ज्ञान का अनुभवन हो।
सहज रागादि मिटते सही हैं।।6।।
तजके रागादि का लक्ष्य दुखमय।
समझो रागादि को तुम करममय ।। 7 ।।
आत्मा तो सदा ज्ञानमय है।
अनुभवन सब करो होके निर्भय ।। 8 ।।
मुक्ति-आगम से भी जाता जाना।
अन्य का अन्य से कुछ न होना ।।9॥
कार्य जिसका है होता उसी से।
कर्त्ता करणादि कारक न पर में ।। 10 ।।
कार्य-कारण में भेद न किंचित्।
कहते व्यवहार से ही कथंचित् ।। 11 ।।
और व्यवहार सत्य नहीं है।
मात्र व्यवहार से ही सही है।। 12 ।।
यह जगत द्रव्य षड्मय है सारा।
इसको कब किसने कैसे है धारा ।। 13 ।।
द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रुवमयी है।
सत् स्वभाव त्रिकाल यही है।।14 ।।
उपादान त्रिकाली है निज गुण।
पूर्ववर्ती अनुत्तर क्षणिक सुन ।। 15 ।।
असली कारण तो कार्य का सुन रे।
योग्यता तत्समय की तू गुन रे ।। 16 ।।
भेद निमित्त के होते नाना।
अंतरंग औ बाह्य प्रमाना।। 17।।
निज का वस्तुत्व निमित्त अंतरंग।
परिणति पर की तो मात्र बहिरंग ।। 18 ।।
ऐसी जब है व्यवस्था रे भ्राता।
परिणमन बिन न कोई भी रहता ।। 19 ।।
कार्य किसका करे कौन कैसे ?
सुख हेतु अतः मान ऐसे ।। 20।।
त्याग जाल विकल्पों का झूठा।
तेरा सुख जिससे प्रकटे अनूठा ।। 21 ।।
और सुख हेतु मारग नहीं है।
वाणी जिनदेव की तो यही है।। 22 ।।