Перейти к содержимому

आत्म अज्ञान ही हिंसा का स्रोतहै

Priyanshu Sahani

0:00 / 0:00

आत्म अज्ञान ही हिंसा का स्रोतहै

829 просмотров · 2 недели назад
Priyanshu Sahani
61 подписчик
829 просмотров · 2 недели назад
मानव समाज में दिखाई देने वाली हिंसा—चाहे वह मानसिक हो, वाचिक (वाणी द्वारा) हो या शारीरिक—केवल बाहरी परिस्थितियों या तात्कालिक कारणों का परिणाम नहीं होती। इसका सबसे गहरा और मूल कारण 'आत्म-अज्ञान' (अपने वास्तविक स्वरूप को न जानना) है। जब व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसका वास्तविक अस्तित्व क्या है, तो वह अज्ञानता के कारण हिंसा के मार्ग पर अग्रसर होता है। इस अवधारणा को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: 1. 'द्वैत' और 'परकापेन' की भावना (Sense of Separation) आत्म-अज्ञान का सबसे पहला परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्वयं को दूसरों से पूरी तरह अलग और भिन्न मानने लगता है। जब तक व्यक्ति को यह बोध नहीं होता कि सभी चेतनाओं में एक ही आत्म-तत्व या मानवता का वास है, तब तक "मैं" और "वह" (अहंकार और परायापन) का भेद बना रहता है। जहाँ परायापन होता है, वहाँ असुरक्षा, भय और प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है, जो अंततः हिंसा में बदल जाती है। 2. अहंकार और असुरक्षा का जन्म अज्ञानता में जी रहा मन अपनी पहचान बाहरी वस्तुओं, विचारों, जातियों, धर्मों या पद-प्रतिष्ठा से जोड़ लेता है। जब इन बाहरी पहचानों पर कोई संकट आता है या कोई चुनौती मिलती है, तो व्यक्ति असुरक्षित महसूस करता है। इस असुरक्षा की रक्षा के लिए मनुष्य क्रोध, घृणा और आक्रमण का सहारा लेता है। आत्म-ज्ञानी व्यक्ति का अहंकार शांत होता है, इसलिए वह किसी भी बाहरी स्थिति से विचलित होकर हिंसा पर उतारू नहीं होता। 3. अनियंत्रित वासनाएँ और तृष्णा (Uncontrolled Desires) स्वयं के भीतर पूर्णता का अनुभव न होना ही अज्ञान है। इस अपूर्णता को भरने के लिए व्यक्ति बाहरी दुनिया से लगातार उपभोग, अधिकार और नियंत्रण की इच्छा रखता है। जब इन इच्छाओं के बीच कोई दूसरा व्यक्ति या बाधा आती है, तो व्यक्ति उसे हटाने के लिए हिंसा (शोषण, अन्याय या शारीरिक आक्रमण) का प्रयोग करता है। 4. विचारों का संकुचित होना (Ideological Violence) जब व्यक्ति अपने संकुचित ज्ञान या मान्यताओं को ही अंतिम सत्य मान लेता है, तो वह दूसरों के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं कर पाता। मानसिक कट्टरता आत्म-अज्ञान का ही रूप है, जो आगे चलकर सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक हिंसा का रूप धारण कर लेती है। निष्कर्ष: हिंसा केवल शस्त्र उठाने से ही नहीं होती, बल्कि मन में उपजे द्वेष और भय से शुरू होती है। आत्म-ज्ञान व्यक्ति को यह समझाता है कि जो दुख या क्षति वह दूसरे को पहुँचा रहा है, अंततः वह उसकी अपनी ही चेतना को प्रभावित करती है। इसलिए, जब तक व्यक्ति अपने भीतर अज्ञान के अंधकार को दूर करके 'आत्म-बोध' प्राप्त नहीं करता, तब तक बाहरी दुनिया में पूर्ण शांति और अहिंसा की स्थापना असंभव है।