Перейти к содержимому

Bb7.7 Shloka 84 _Rukmini Deara Gopiyon Ka Mahima Gaan

Hari Katha Amrit

0:00 / 0:00

Bb7.7 Shloka 84 _Rukmini Deara Gopiyon Ka Mahima Gaan

45 просмотров · 1 дн. назад
Hari Katha Amrit
3,36 тыс. подписчиков
45 просмотров · 1 дн. назад
श्रीरुक्मिणी, गोपियों की महिमा गान करते हुए कह रही हैं -- सबका परम ध्येय श्रीकृष्ण हैं और गोपियां श्रीकृष्ण का भी ध्येय बन गईं हैं। अर्थात कृष्ण, गोपियों का भजन करते हैं। लीला प्रसंग ---- ---- जब राधाजी मान कर लेतीं हैं तो उनको मनाने के लिये श्रीकृष्ण राधाकुण्ड पर दिन में तीन बार स्नान करते हैं। श्रीरुक्मिणी कह रही हैं कि इसीलिए हमारी तुलनामें गोपियों के प्रति श्रीकृष्ण का अधिक प्रेम का प्रकाश करना उपयुक्त ही है। क्योंकि हमलोग प्रभुकी विवाहित पत्नियाँ हैं और पतिभावके से युक्त होकर प्रभुकी सेवा करती हैं। किन्तु गोपियाँ उक्त धर्म-कर्म आदि विषयोंमें आकांक्षारहित होकर शुद्ध भावसे प्रभुकी सेवा करती हैं। अतएव गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णका भाव हमारी तुलनामें अधिक तथा उत्कृष्ट होना युक्तिसंगत ही है। यह भाव हमारे लिए मात्सर्यका विषय नहीं, बल्कि प्रशंसनीय है, क्योंकि वैसा भाव ही हमारे प्रभुको प्रिय है। भक्तों में मात्सर्य का भाव नहीं होता है। भक्तों की कृपा से ही भगवान् प्राप्त होते हैं। लीला वर्णन---- --- वेणुगीत ---- रासलीला से कृष्ण का अंतर्ध्यान होना। ---+ प्रकट होना -- जगत् में तीन प्रकार के लोग होते हैं। katha---- --- भगवान के सिर में दर्द होना और उपचार हेतु भक्त के चरण धूलि माथे पर लगाना। गोपियां कृष्ण के क्षणमात्र सुख के लिए कुछ भी कर सकती हैं। गोपियों का कृष्ण के प्रति विशुद्ध प्रेम है। कृष्ण की सर्वोत्तम सेवा करतीं हैं। लीला ---- --- रात में कृष्ण जावट गये। ---- दरवाजा खटखटा कर कहा, मैं हरि हूँ। अन्य लीलाओं का वर्णन। ---- संकेत वन --- कोकिला वन ---- वेणु ध्वनि सुनकर गोपियां सब कुछ छोड़ कर रात में बन पहुँच गई। ----- कृष्ण से हास परिहास ----- कृष्ण को उपपति मान कर गोपियां उनकी सेवा करतीं हैं। श्रीरुक्मिणीदेवीके कहा- अतएव यह श्रेष्ठ भाव हमारे प्रभुकी अपने प्रियजनोंके प्रति अधीनता स्वीकार कर उनकी महिमा को ही प्रकाश कर रहा है। वे हमारे स्वामीकी प्रियाएँ हैं, इस प्रकार की सेवा हम नहीं कर सकतीं। उनकी सेव उत्तम है इसलिए कृष्ण का प्रेम भी उनके लिए उत्तम है। इसलिए वे उनके प्रेमकी पराधीनतारूप माहात्म्यको ही बढ़ा रहे हैं।