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BB 7.1 Shloka 1-16 _Krishna Ka Nav Vrindavan Mein Aana

Hari Katha Amrit

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BB 7.1 Shloka 1-16 _Krishna Ka Nav Vrindavan Mein Aana

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Hari Katha Amrit
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ब्रजवासियों के विरह की अवस्था सुनकर श्रीकृष्ण क्रन्दन करने लगें। क्षणभर में ही भगवान् का क्रंदन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो गया। उनको सांत्वना देने वाला कोई नहीं था। अतः ब्रह्माजी वहां पर अपने परिवार के साथ उपस्थित हुए। अपने प्रभु की कातर दशा देखकर श्री ब्रह्माजी भी धैर्य से च्युत होकर स्वयं भी रोने लगे। ------ सन्दर्भ कथा राम भरत का मिलाप। तदनन्तर श्रीब्रह्मा ने यत्नपूर्वक स्वयं धैर्य धारण कर प्रभु को स्वस्थ करनेके लिए उपाय की चिन्ता करने लगे। भगवान् की यह मोहग्रस्त लीला है। ऐसी लीला से भगवान अपने भक्तों की महिमा प्रकाशित करना चाहते हैं। भगवान्‌ की मोहदशा को देखकर गरुड़जी भी मूच्छित हो गये थे। इसलिए श्रीब्रह्मा सर्वप्रथम उनको सचेत कराकर कहने लगे। श्री ब्रह्माजी ने बताया कि द्वारका में विश्वकर्मा द्वारा निर्मित नव वृन्दावन है। जहाँ सबकी प्रतिमा है। गरुड़जी को ब्रह्माजी ने कहा कि तुम नव वृन्दावन में श्रीरोहिणी देवी, कृष्ण और बलराम को ले जाओ। ताकि श्रीभगवान्‌ अपनी चेतना में वापस आ सकें। ---- कथा गरुड़ जी स्वर्ग में अमृत लेने गए । श्रीउद्धव सहित श्रीदेवकी आदि उस नवनिर्मित वृन्दावनमें आयीं। किन्तु श्रीब्रह्माकी प्रार्थनाके अनुसार वे सब श्रीकृष्णके निकट नहीं गये। श्रीनारद भगवान्‌ के मूच्छित हो जाने के कारण अपने आपको अपराधी समझने लगे। श्रीवसुदेव आदि यादवों अथवा श्रीब्रह्मा आदि देवताओं के साथ भी वे नव-वृन्दावनमें नहीं गये। श्रीनारद आकाश से ही भगवान् की लीला के दर्शन करने लगें।