Wo Mera Tha Hi Nahi | Jagjit Singh Superhit Ghazals
SuvYr
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Wo Mera Tha Hi Nahi | Jagjit Singh Superhit Ghazals
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जो था ही नहीं
जिसे खोने का डर था, वो मेरा था ही नहीं,
जिसे अपना समझा था, वो अपना था ही नहीं।
हम उम्र भर जिसको मोहब्बत कहते रहे,
शायद वो रिश्ता कभी रिश्ता था ही नहीं।
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वो साथ था तो दुनिया हसीन लगती थी,
वो दूर हुआ तो जाना—वो दुनिया था ही नहीं।
हमने उसकी ख़ामोशी को प्यार समझ लिया,
उसके दिल में हमारे लिए कुछ था ही नहीं।
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मैं ख़त लिखता रहा, वो पढ़ता रहा शायद,
मगर जवाब देने का इरादा था ही नहीं।
हम इंतज़ार में उम्र गुज़ारते रहे,
उसे लौटकर आने का वादा था ही नहीं।
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अब आईने से रोज़ यही पूछता हूँ मैं,
जिसे ढूँढता हूँ, वो चेहरा था ही नहीं।
शायद कमी मोहब्बत में नहीं थी मेरी,
बस उसके दिल में मेरा हिस्सा था ही नहीं।
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मुखड़ा
अब न शिकायत है,
न कोई सवाल है।
जो चला गया...
शायद...
वो मेरे हिस्से का...
सिर्फ़ एक ख़याल था।
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कभी-कभी याद आती है वो पहली मुलाक़ात,
फिर ख़ुद ही मुस्कुराकर हम चुप हो जाते हैं।
कुछ लोग ज़िंदगी में इसलिए आते हैं,
ताकि हमें ख़ुद से मिलना सिखा जाते हैं।
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मक़ता
"फ़लक" अब किसी से वफ़ा की उम्मीद नहीं,
दिल को फिर किसी के हवाले करना नहीं।
जो अपना था वो रहा, जो गया उसे जाने दिया,
अब किसी को खोकर ख़ुद को खोना नहीं।