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काहे बाँधे बोझ रे मनवा | Kaahe Baandhe Bojh | Kabir Bhajan | निर्गुण भजन | मन का मोह

Divine Bhakti Vibes

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काहे बाँधे बोझ रे मनवा | Kaahe Baandhe Bojh | Kabir Bhajan | निर्गुण भजन | मन का मोह

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काहे बाँधे बोझ रे मनवा, काहे गाँठ लगाए… माया, धन और मोह की गठरी जितनी कसते जाओ, मन उतना ही भारी होता जाता है। यह कबीराना लोक-भजन उसी मन से पूछता है — जब सब यहीं छूट जाना है, तो इतना मोह क्यों? नाव को पार जाना है तो उसमें पानी नहीं, राम-नाम की खेवैया चाहिए। जो भीतर की ज्योत जगा ले, उसके लिए अँधेरा भी झुक जाता है। 🌿 “काहे बाँधे बोझ रे मनवा…” एक फकीराना पुकार — पकड़ छोड़, गाँठ खोल, मन हल्का कर। 🎵 Lyrics सागर तीरे महल सजाए, कंकड़-पत्थर जोड़। एक लहर में ढह जाना सब, काहे करे मरोड़? राम-नाम की खेवैया नैय्या, पार लगाए तोर… अरे मनवा रे… काहे रे… काहे बाँधे बोझ रे मनवा, काहे गाँठ लगाए? पानी ऊपर नाव चले जब, पार वही ले जाए। नाव में पानी भरे जो मूरख, बिना डुबाए न माने… काहे बाँधे बोझ रे मनवा, काहे गाँठ लगाए! बाँध-बाँध के धन की गठरी, खोल न पाया मन का आँगन। गंदले पोखर प्यास न बुझती, बन जा बहता सावन। कस्तूरी तो घट में महके, बन-बन भटके हिरना। तू माटी का दीपक होकर, सूरज से क्या डरना? जोत जगा ले भीतर अपनी, तम खुद झुक-झुक जाए रे मनवा, काहे गाँठ लगाए! सूखी डाली पर जो बैठे, पंछी कभी न रोए। डाल पे उसको आस नहीं है, पंख पे परबत तोले! तू क्यों डरता कल की रुत से? अंबर बाँह पसारे। पेड़ कभी फल खुद न खाए, नदियाँ प्यास उबारे। जितना बाँटे उतना मीठा, रस जीवन का हो जाए रे मनवा, काहे गाँठ लगाए! न पकड़! न जकड़! छोड़ दे पकड़! हाथ जो खाली… तो अंबर की थाली! जितना लुटाए, उतना समाए! उड़ जा… उड़ जा… रे पंछी, उड़ जा! चार दिना की छाँव मिली है, हँस के क्यों न बिताए… हँस के क्यों न बिताए रे मनवा, हँस के क्यों न बिताए! मनवा रे… सागर तीरे महल न भाए… गाँठ खुली… भार ढला… राम-नाम की खेवैया नैय्या… भवसागर तर जाए… 🙏 राम नाम सत्य है। मन हल्का रखो। मोह की गाँठ खोलो। #KabirBhajan #KabirVani #KabirKeDohe #NirgunBhajan #KabirBhajan #HindiBhajan #BhaktiGeet #Bhajan #Kabir #Nirgun #SantKabir #RamNaam #SpiritualSongs #IndianFolk #FolkBhajan #DevotionalSongs #HindiDevotional #ManKaMoh #Maya #Vairagya #Adhyatm #Satsang #LyricalVideo