बलि जाउँ हौं राम गुसाईं | प्रभु श्रीराम के चरणों में तुलसीदास जी की विनय | Vinay Patrika Pad 195
Pranav Geet
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बलि जाउँ हौं राम गुसाईं | प्रभु श्रीराम के चरणों में तुलसीदास जी की विनय | Vinay Patrika Pad 195
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🙏 *जय श्रीराम | श्री सीताराम जय राम जय जय राम* 🙏
🌺 *बलि जाउँ हौं राम गुसाईं | विनय पत्रिका पद 195* 🌺
गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर कृति श्री विनय पत्रिका का पद 195 — *“बलि जाउँ हौं राम गुसाईं”* प्रभु श्रीराम के प्रति भक्तिभाव, प्रेम और समर्पण की पावन अभिव्यक्ति है।
इस भावपूर्ण पद के माध्यम से तुलसीदास जी प्रभु श्रीराम के प्रति अपनी विनय अर्पित करते हैं। भक्त और भगवान के बीच प्रेम, श्रद्धा तथा आत्मसमर्पण का यह भाव श्रीराम भक्ति की उस परंपरा का स्मरण कराता है, जिसमें भक्त अपने आराध्य के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है।
🎶 *Pranav Geet* की इस भक्तिमय प्रस्तुति के साथ श्री विनय पत्रिका के भावसागर में डूबिए और प्रभु श्रीराम की भक्ति, करुणा तथा प्रेम का अनुभव कीजिए।
✨ *इस प्रस्तुति की विशेषताएँ:*
🙏 गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर वाणी
🌺 प्रभु श्रीराम के चरणों में प्रेमपूर्ण विनय
🎵 श्री विनय पत्रिका का भक्तिरस से परिपूर्ण पद
🪔 सनातन भक्ति परंपरा और आध्यात्मिक संगीत का संगम
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🌼 *श्री सीताराम जी की जय!*
🙏 *जय सियाराम!*
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📚 *रचना:* श्री विनय पत्रिका
✍️ *रचनाकार:* गोस्वामी तुलसीदास जी
🎵 *पद संख्या:* 195
📺 *चैनल:* Pranav Geet
🎼 *श्रृंखला:* Vinay Patrika – Prem Nivedan
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Vinay Patrika Live Bhajan & Kirtan
🌼 Event Theme:
“Vinay Patrika: ek Prem Nivedan”
An evening of devotion, compassion & surrender,
jahan Vinay Patrika ke bhav-poorn bhajans ke saath
simple Hindi bhajans bhi gaye jaate hain,
jo har age group aur har bhakt ke liye easy aur soulful hote hain.
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सदगुरुदेव भगवान श्री राजेन्द्र दास जी महाराज की कृपा और आज्ञा से विनय पत्रिका का यह दिव्य कार्य प्रारम्भ हुआ है और आगे भी होता रहेगा। हम उन्हें अनंत कोटि दंडवत प्रणाम कर हृदय से अपनी कृतज्ञता अर्पित करते हैं। 🙏✨
🙏 Lyrics by: Goswami Tulsidas ji [ Vinay Patrika ]
🎵 Vocals & Music:Rajesh K. Sharma [ PRANAV GEET ]
🙏Video- Bharti Sharma
📿 Bhakti Ras | Spiritual Song | Ram Bhajan
💠 Playlist देखें: [ • 🌸All Vinay Patrika Bhajans | Tulsi Das Ji ... ]
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Lyrics-
बलि जाउँ हौं राम गुसाईं । कीजै कृपा आपनी नाईं ॥ १ ॥
परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई।
कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई ॥ २ ॥
जहँ जहँ चित चितवत हित, तहँ नित नव बिषाद अधिकाई ।
रुचि-भावती भभरि भागहि, समुहाहिं अमित अनभाई ॥ ३ ॥
आधि-मगन मन, ब्याधि-बिकल तन, बचन मलीन झुठाई।
एतेहुँ पर तुमसों तुलसीकी प्रभु सकल सनेह सगाई ॥ ४ ॥
भावार्थ
हे मेरे नाथ श्रीरामजी ! मैं आप पर बलि जाता हूँ। आप अपने स्वभाव से ही मुझपर कृपा कीजिये ॥ १ ॥
परमार्थ के, स्वर्ग के तथा सांसारिक स्वार्थ के सुख देने वाले और कल्याण कारक जितने (शम, दम, तप, यज्ञ आदि) उपाय हैं, उन सबकी रीतियों को कलियुगने क्रोध करके लुप्त कर दिया है, और अपनी (दम्भ, कपट, निन्दा आदि) दुःखदायक कुचालों को चला दिया है ॥ २॥ जहाँ-जहाँ यह मन अपना हित देखता है, वहीं नित्य नये दुःख बढ़ते ही जाते हैं। रुचि को अच्छी लगने वाली बातें दूर से ही डरकर भाग जाती हैं और जिनको मन नहीं चाहता वे ही अपार चीजें सामने आ जाती हैं। अर्थात् सुख के लिये चेष्टा करने पर भी अपार दुःख ही आते हैं ॥ ३ ॥
मन चिन्ताओं में डूब रहा है, शरीर रोगों के मारे व्याकुल है, और वाणी झूठी तथा मलिन हो रही है (सदा असत्य, कठोर और कुवाच्य ही बोलती है)। किन्तु यह सब होते हुए भी हे नाथ !आपके साथ इस तुलसीदास का सम्बन्ध और प्रेम ज्यों-का-त्यों बना हुआ है (धन्य हैं जो इस प्रकार के अधम के साथ भी प्रेम का सम्बन्ध स्थायी रखते हैं।) ॥ ४ ॥