माँ ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा और महिमा एवं माँ का वंदन* #नवरात्रि #navratri
Atharvaveda -- अथर्ववेद
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माँ ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा और महिमा एवं माँ का वंदन* #नवरात्रि #navratri
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माँ ब्रह्मचारिणी हिन्दू धर्म में नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं।
स्वरूप और पहचान
• अर्थ: 'ब्रह्म' का अर्थ तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ आचरण करने वाली है। अर्थात् तप का आचरण करने वाली।
• वेेशभूषा: वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं।
• हाथों में: उनके दाहिने हाथ में जप की माला (अष्टदल माला) और बाएं हाथ में कमंडल रहता है।
• महत्व: यह रूप तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम का प्रतीक है।
कथा और महत्व
• मान्यता के अनुसार, माँ ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं।
• देवर्षि नारद के कहने पर उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी।
• हजारों वर्षों की तपस्या और कठिन नियमों के कारण उन्हें 'ब्रह्मचारिणी' या 'तपश्चारिणी' कहा गया।
• उनकी उपासना करने से भक्तों के भीतर आंतरिक स्थिरता, मानसिक दृढ़ता, धैर्य और संयम का विकास होता है।