काम पर जाने का समय
डॉ. उर्वशी
0:00 / 0:00
काम पर जाने का समय
24 просмотра · 3 месяца назад
डॉ. उर्वशी
3,43 тыс. подписчиков
24 просмотра · 3 месяца назад
यह कविता समकालीन समय के बौद्धिक, सामाजिक और काव्यात्मक संकट की तीखी पड़ताल करती है, जहाँ एक ओर बूढ़ों की चुप्पी, पराजय और रहस्य हैं, तो दूसरी ओर दिशाहीन और उदास युवा पीढ़ी का संकट उपस्थित है। कवि “पहाड़” को एक ऐसे रूपक में बदल देता है जो पीढ़ियों की असफलताओं, समझौतों और मौन पराजयों का बोझ उठाए खड़ा है। कविता का सबसे तीखा और व्यंग्यपूर्ण पक्ष उन कवियों पर प्रहार है जो वास्तविक सामाजिक संघर्षों से कटकर आत्ममुग्ध, कृत्रिम और निरर्थक साहित्यिक प्रयोगों में उलझे हुए हैं; “नई कविता का स्वाद” जैसी पंक्तियाँ साहित्यिक पाखंड और आत्मरति पर करारा व्यंग्य बन जाती हैं। इसके बरअक्स कवि युवाओं को भय, निष्क्रियता और समयपूर्व बूढ़ेपन से बाहर निकलने का आह्वान करता है तथा इतिहास, प्रतिरोध और परिवर्तन की संभावनाओं की ओर लौटने का आग्रह करता है। अंतिम पंक्तियों में “कवियों के काम पर लौटने” की पुकार वस्तुतः कविता को उसके मूल सामाजिक दायित्व—सत्य के पक्ष में खड़े होने, समय की आलोचना करने और जनजीवन से जुड़ने—की ओर वापस बुलाने का घोष है।