महाभारत के बाद के 36 सालों की कथा
डॉ. उर्वशी
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महाभारत के बाद के 36 सालों की कथा
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मयंक मुरारी जी की पुस्तक ‘जौवन के अर्थ की खोज’ जीवन को देखने की एक ऐसी व्यापक और बहुआयामी दृष्टि प्रस्तुत करती है, जिसमें मनुष्य केवल अपने अस्तित्व का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि वह समूची सृष्टि, प्रकृति, समय और चेतना के साथ अपने गहरे संबंधों की खोज करता दिखाई देता है। धर्म, मिथक, अध्यात्म, दर्शन और विज्ञान के विविध आलोक से गुजरती हुई यह कृति प्राचीन से आधुनिक और उत्तर-आधुनिक समय तक मनुष्य और जीवन की विकास-यात्रा को समझने का गंभीर प्रयत्न है। लेखक ने विश्व-चिंतन की समृद्ध परंपरा और अनेक महत्वपूर्ण विचारकों के निष्कर्षों को आधार बनाकर अपनी स्वतंत्र दृष्टि विकसित की है, इसलिए पुस्तक किसी एक विचार या निष्कर्ष में बंधी हुई नहीं, बल्कि निरंतर प्रश्नाकुल और संवादधर्मी है। जीवन-मरण के बीच स्पर्श, स्वर, स्मृति, गति, ठहराव, अस्मिता, प्रेम, करुणा, सुख-दुःख, आनंद, मनुष्यत्व, भौतिकता और उत्थान-पतन जैसे प्रश्नों से जूझते हुए लेखक अंततः मनुष्य की उस आंतरिक यात्रा को रेखांकित करता है, जिसमें मंजिल से अधिक महत्त्व यात्रा का है और भागते हुए समय में ठहरकर जीवन को महसूस कर पाने का आनंद ही उसकी सार्थकता बन जाता है। पंचमहाभूतों के प्रति कृतज्ञता, मातृत्व, संगीत और सकारात्मक ऊर्जा की प्रतिष्ठा पुस्तक को केवल दार्शनिक विमर्श नहीं रहने देती, बल्कि उसे मनुष्यता की पुनर्खोज का संवेदनशील दस्तावेज बना देती है। ‘जौवन के अर्थ की खोज’ दरअसल मनुष्य को मनुष्य से, मनुष्य को प्रकृति से और जीवन को सृष्टि की विराट संयुक्तता से जोड़ने वाली एक ऐसी चिंतन-यात्रा है, जो पाठक को उत्तर देने से अधिक अपने भीतर के प्रश्नों से साक्षात्कार कराती है।