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आस्रव भावना और संवर भावना | समुद्रपाल एवं हरिकेशी मुनि की प्रेरक कथा | गुरु कृपा वाणी Episode 17

Guru Krupa Vaani | गुरु कृपा वाणी

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आस्रव भावना और संवर भावना | समुद्रपाल एवं हरिकेशी मुनि की प्रेरक कथा | गुरु कृपा वाणी Episode 17

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Guru Krupa Vaani | गुरु कृपा वाणी
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जय जिनेन्द्र 🙏 गुरु कृपा वाणी के एपिसोड 17 में आज हम बारह भावनाओं में से दो अत्यंत महत्वपूर्ण भावनाओं पर चिंतन करेंगे— 🔸 आस्रव भावना — कर्म आत्मा में आते क्यों हैं? 🔸 संवर भावना — कर्मों के आने का मार्ग रोका कैसे जाए? इस एपिसोड में इन दोनों भावनाओं को दो प्रेरक कथाओं के माध्यम से समझाया गया है— समुद्रपाल की कथा — एक बंधे हुए चोर को देखकर समुद्रपाल ने कर्मों के बंधन और संसार की पराधीनता पर गहरा चिंतन किया। यही चिंतन उनके भीतर वैराग्य का कारण बना। हरिकेशी मुनि की कथा — अपमान, उपहास और शारीरिक पीड़ा के बावजूद हरिकेशी मुनि ने क्रोध और द्वेष को अपने भीतर स्थान नहीं दिया। संयम, समता और तप के माध्यम से उन्होंने संवर के वास्तविक स्वरूप को समझाया। इस एपिसोड का मुख्य संदेश है— आस्रव हमें दिखाता है कि कर्म कहाँ से आ रहे हैं, और संवर हमें सिखाता है कि उनके आने का मार्ग कैसे रोका जाए। अपने जीवन में भी विचार करें— मेरे भीतर कर्मों के आने के कौन-कौन से द्वार खुले हैं? क्रोध, मान, माया, लोभ, तृष्णा या असंयम? और आज मैं इनमें से किसी एक द्वार को बंद करने के लिए क्या कर सकता हूँ? यही है आस्रव से संवर तक की आत्मयात्रा। 🙏 गुरु कृपा वाणी जैन दर्शन, बारह भावना और आत्मचिंतन को सरल एवं भावपूर्ण रूप में समझने का एक प्रयास। #गुरुकृपावाणी #आस्रवभावना #संवरभावना #समुद्रपाल #हरिकेशीमुनि #जैनधर्म #जैनदर्शन #बारहभावना #आत्मचिंतन #Jainism #JainDharma