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गजसुकुमाल की अद्भुत आत्मयात्रा | अन्तकृतदशांग सूत्र | द्वितीय और तृतीय वर्ग | एपिसोड 25

Guru Krupa Vaani | गुरु कृपा वाणी

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गजसुकुमाल की अद्भुत आत्मयात्रा | अन्तकृतदशांग सूत्र | द्वितीय और तृतीय वर्ग | एपिसोड 25

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Guru Krupa Vaani | गुरु कृपा वाणी
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जय जिनेन्द्र 🙏 गुरु कृपा वाणी के इस विशेष एपिसोड 25 में हम सुनेंगे अन्तकृतदशांग सूत्र के द्वितीय और तृतीय वर्ग से जुड़े अत्यंत भावपूर्ण और अद्भुत प्रसंग। इस विशेष कथा का केंद्र हैं गजसुकुमाल — जिनकी आत्मयात्रा राजसी वैभव से शुरू होकर दीक्षा, घोर तपस्या, उपसर्ग, समता और अंततः केवलज्ञान एवं निर्वाण तक पहुंचती है। इस एपिसोड में जानिए— 🔹 देवकी महारानी के मन की अधूरी मातृ-ममता 🔹 श्रीकृष्ण द्वारा अपनी माता की इच्छा को समझना और उन्हें एक छोटा सहोदर भाई प्राप्त हो, ऐसा प्रयास करना 🔹 गजसुकुमाल का जन्म और उनका राजसी बाल्यकाल 🔹 सोमा के साथ विवाह का प्रसंग 🔹 भगवान अरिष्टनेमि की देशना सुनकर गजसुकुमाल के भीतर उत्पन्न वैराग्य 🔹 राजसी जीवन का त्याग और अनगार धर्म की दीक्षा 🔹 महाकाल श्मशान में गजसुकुमाल की घोर साधना 🔹 उनके ऊपर किया गया भयंकर उपसर्ग 🔹 खैर की लकड़ी के जलते हुए अंगारों के बीच भी उनकी अटूट समता 🔹 केवलज्ञान की प्राप्ति और गजसुकुमाल का सिद्ध, बुद्ध एवं मुक्त होना 🔹 भगवान अरिष्टनेमि द्वारा श्रीकृष्ण को गजसुकुमाल के निर्वाण का समाचार 🔹 और अंत में सोमिल ब्राह्मण से जुड़ा प्रसंग यह केवल एक कथा नहीं है। यह हमें दिखाती है कि वेदना शरीर को हो सकती है, लेकिन आत्मा को समता में स्थिर रखा जा सकता है। संसार का वैभव क्षणिक है, लेकिन आत्मा की यात्रा शाश्वत है। गजसुकुमाल की कथा हमें वैराग्य, संयम, समता, कर्मनिर्जरा और मोक्ष की दिशा में देखने की प्रेरणा देती है। गुरु कृपा वाणी के साथ जैन आगमों, सिद्धांतों और प्रेरणादायक कथाओं को सरल भाषा में सुनते और समझते रहिए। नमो सिद्धाणं। 🙏 जय जिनेन्द्र।